जीवन और राजनीति का अवलोकन
दुलारचंद यादव 30 अक्तूबर 2025 की दोपहर पटना ज़िले के मोकामा में एक नदी-राह पर मारे गए। उम्र अख़बारों में 75 या 76 लिखी गई। वे टाल के बाहुबली थे, यानी गंगा के दक्षिण वाले दलदली इलाक़े के मज़बूत आदमी, और उन्होंने बिहार विधानसभा के कम से कम तीन चुनाव तीन अलग-अलग दलों के टिकट पर लड़े। जिस-जिस चुनाव का मतगणना पन्ना इस डेस्क को मिला, हर एक में वे हारे। वे कभी विधायक नहीं बने। टाइम्स ऑफ इंडिया की मौत के दिन वाली रिपोर्ट ने उन्हें लालू प्रसाद का पुराना हमराही लिखा और उनकी हत्या को 2025 के बिहार चुनाव की पहली मतदान-हिंसा बताया।
इस अभिलेख में उनका पेज दो बातों से बनता है। पहली हत्या है और उसके बाद जो कुछ गिरा: तीन या उससे ज़्यादा प्राथमिकियाँ, जिनमें एक ने सत्तारूढ़ दल के उम्मीदवार समेत पांच नाम लिखे; दो थानाध्यक्षों के निलंबन; चुनाव आयोग के लिखित आदेश से हटाए या बदले गए चार पुलिस व राजस्व अधिकारी; अपराध अनुसंधान विभाग की टीम; एक गिरफ़्तारी; चौदह दिन की न्यायिक हिरासत; जेल से लड़ा और जीता गया चुनाव; और साढ़े पांच महीने बाद पंद्रह हज़ार रुपये के मुचलकें पर उच्च न्यायालय का ज़मानत आदेश। दूसरी बात यह है कि उनकी ज़िंदगी सार्वजनिक कागज़ों से जोड़ना आसान है और उनकी मौत को सीधे कहना कठिन। कागज़ आपस में इस बात पर नहीं मानते कि जिस दिन वे मरे, उस दिन वे कौन थे। किसी ने उन्हें जनसुराज का कार्यकर्ता लिखा, किसी ने समर्थक, किसी ने पुराने राजद के नेता, किसी ने डकैत से नेता बना आदमी और किसी ने समाजसेवी। यहाँ वही लिखा है जो कागज़ कहते हैं और जो उन्होंने खुद भर था।
यह पेज किन दस्तावेज़ों से बना है
ज़िंदगी की हड्डी चार कागज़ों और चार रिपोर्टों से मिलती है। कागज़ हैं: 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में बारह सीट का उम्मीदवार-वार मतगणना पन्ना; उसी चुनाव के लिए उनके भर हुए शपथ पत्र की प्रत, जो एसासिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स के माईनेटा अभिलेख में है; पटना पुलिस का प्रेस रिलीज़; और पटना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के कार्यालय का बयान। रिपोर्टें हैं: हत्या के दिन की टाइम्स ऑफ इंडिया की ख़बर; अगले दिन की बीबीसी हिंदी की छानबीन; रिमांड सुनवाई पर हिंदू की रिपोर्ट; और 19 मार्च 2026 की ज़मानत पर हिंदुस्तान टाइम्स व इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट। नीचे दिया गया हर उद्धरण 2 अक्तूबर 2026 को इस डेस्क ने पन्ने पर पढ़ी गई प्रत से उठाया है।
बाक़ी सब बहस की जगह है और वैसे ही दर्ज है। उम्र, गाँव, दल, वह थाना जहाँ शिकायत लिखी गई, शिकायतों की गिनती, गोली किसने चलाई, मौत किससे हुई, दो आरोपियों के नाम और शिकायत करने वाले पोते का नाम, ये सब स्रोतों में बदलते हैं। यहाँ किसी बदलाव को जोड़कर नहीं बताया गया।
टाल का इलाक़ा
जिस इलाक़े ने उन्हें बनाया, उसका एक शब्द में वर्णन ज़रूरी है, क्योंकि 'टाल' शब्द में मोकामा की राजनीति की सारी अजीबोगरीब बात आती है। बीबीसी हिंदी लिखता है कि पटना के फ़तुहा से लेकर लखीसराय विधानसभा क्षेत्र तक की पट्टी को टाल कहते हैं, कि यहाँ की मिट्टी दलहन की फ़सल के लिए बहुत उपजाऊ मानी जाती है, और कि आज़ादी से पहले यह इलाक़ा नौवाहन और रेल का बड़ा केंद्र था। उसी रिपोर्ट में उन फैक्टरियों के नाम हैं जो इस लोकेशन की वजह से लगीं और बाद में एक-एक कर बंद हुईं: यूनाइटेड स्प्रिट, यानी मैकडॉल वाला नाम, नेशनल टेक्सटाइल कॉरपोरेशन, भारत वैगन एंड इंजीनियरिंग कंपनी, और बाटा का चमड़े का कारखाना। कारखानों के बाद क्या बचा, यही उस सामग्री में लिखी सबसे सीधी बात है। बीबीसी कहता है कि ये इकाइयाँ धीरे-धीरे बंद होती गईं और इस पूरे इलाक़े की पहचान सिर्फ़ बाहुबलियों से रह गई।
हिंदू हत्या की जगह का नक़शा देता है। वह मोकामा को टाल, यानी दलदली इलाक़ा, कहता है और घटनास्थल तारतर गाँव बताता है, जहाँ 1990 के दशक के एक बाहुबली को दोपहर की धूप में मारा गया। टाइम्स ऑफ इंडिया ने उसी टकराह को पटना ज़िले के मोकामा टाल में रखा और कहा कि बहस बसावनचक गाँव के पास घोसवरी थाना क्षेत्र में शुरू हुई। यानी नदी-राह, दलदल और ये दो गाँव उस शहर से लगभग पंद्रह किलोमीटर दूर हैं जिसका नाम विधानसभा सीट लेती है, और ये सब बंद कारखानों व टूट चुकी ज़मीदारी-व्यवस्था की राजनीति से जुड़ते हैं।
लाल झंडा, और जिस नाम से लोग उन्हें बुलाते थे
उनकी पुरानी बदनामी के दो बयान उस समय के काम करने वाले पत्रकारों से मिलते हैं, और दोनों बीबीसी हिंदी ने छापे हैं।
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद ने 1995 का एक चुनाव याद किया, जिसकी कवरेज करने वे गए थे। अहमद ने बीबीसी से कहा कि वह दुलारचंद का प्राइम टाइम था और उनकी छवि एक ऐसे डकैत की थी जो लाल झंडा लेकर डकैती करता था; उन्होंने यह भी कहा कि इसका असली मतलब क्या था, यह बताया नहीं जा सकता। अहमद ने वह वाकया भी सुनाया जो उन्हें उनके रिकॉर्ड से बड़ा बनाता है। उस चुनाव में दुलारचंद ने कहा था कि लालू यादव बिहार के मुख्यमंत्री होंगे, मगर टाल के मुख्यमंत्री मैं हूं'।
दूसरा बयान याद नहीं, छपा हुआ है। बीबीसी पटना से निकलने वाली पत्रिका न्यूज़ब्रेक में 2001 में प्रकाशित पत्रकार कमल किशोर विनीत का एक लेख उद्धृत करता है। उस लेख में लिखा था कि इस बाहुबली पर लालू की कृपा थी, कि विधायक न होते हुए भी इन्हें पटना में फ़्लैट मिला, साथ में टेलीविज़न और गाड़ी, और कि सत्ता की ओट में इन्हें कई नामी-गिरामी बाज़ारों से रंगदारी वसूलने का अधिकार भी मिल गया था। ओट लेकर वसूली करने की क्रिया को ही हिंदी में रंगदारी कहते हैं, और यही उस लेख का आरोप था। यहाँ इसे विनीत का 2001 में लिखा हुआ दावा मानकर छपा है, किसी अदालत का फ़ैसला नहीं।
स्थानीय नाम उसी बीबीसी रिपोर्ट में दर्ज है। दुलारचंद इलाक़े में पहलवान जी के नाम से मशहूर थे, यानी कुश्ती वाले सम्मान-शब्द से। रिपोर्ट यह भी कहती है कि लालू यादव ने उनके गाँव तारतर में चरवाहा विद्यालय खुलवाया था। दोनों तथ्य साथ में अजीब लगते हैं। बाज़ारों से रंगदारी वसूलने का आरोप लगाने वाला आदमी ताक़त के एक सम्मान-नाम से याद है, और जिस गाँव का नाम उसके साथ जुड़ा है, वहां एक संरक्षक की ख़ुशी से स्कूल खुला।
तीन चुनाव, और जो जमा छीन गया
उनके तीन चुनाव तारीख़ के साथ बताए जा सकते हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया की मरने के बाद लिखी गई रिपोर्ट ने पहले का एक वाक्य में हिसाब दिया: ज़मानत पर बाहर रहते हुए उन्होंने 1990 का विधानसभा चुनाव लोकदल के टिकट पर लड़ा और दूसरे बाहुबली दिलीप सिंह से मामूली अंतर से हार गए। दिलीप सिंह, जिन्हें उनके समर्थक सरकार कहते थे, अनंत सिंह के बड़े भाई थे, यानी उसी आदमी के, जिसे बत्तीस-पैंतीस साल बाद उनका हत्यारा ठहराया गया। उस सीट पर हिंदू का 1990 का रिकॉर्ड एक जगह अलग है, और वह उस चुनाव का हिसाब है, इनका नहीं: 1990 में दिलीप सिंह ने कांग्रेस के श्याम सुंदर सिंह वीरज को हराकर सीट जीती। यानी लोकदल वाली बात और वीरज वाली बात एक ही चुनाव के दो वर्णन हैं, और दोनों यहाँ छपी हैं।
दूसरा चुनाव 1995 का है, और स्रोत बीबीसी में सुरूर अहमद की याद है: दुलारचंद ने वह चुनाव बृजनंदन यादव के ख़िलाफ़ लड़ा और बृजनंदन जीते। टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी श्रृंखला में उसी चुनाव को उसी साल से जोड़ा।
तीसरा कागज़ से सिद्ध है और सबसे ज़्यादा बोलता है। 2010 के बिहार विधानसभा चुनाव में बारह सीट का उम्मीदवार-वार नतीजा, जो इंडियावोट्स ने रिटर्निंग ऑफ़िसर की गिनती से छपा है, पंद्रह उम्मीदवार दिखाता है। तेरहवें नंबर पर, 598 वोट और 0.53 प्रतिशत हिस्सेदारी पर, दुलारचंद यादव हैं, उम्र 60, पुरुष, और टिकट जनता दल (सेक्युलर) का। विजयी ज्ञानेंद्र कुमार सिंह ने जनता दल (यूनाइटेड) से 53,129 वोट लिए और 47.01 प्रतिशत हासिल किया; राजद के विजय कृष्ण ने 33,734। ग्यारह आपराधिक मामले रखने, दलदल पर बरसों के राज और तीस साल के नाम की पहचान वाले आदमी को उस सीट के बिल्कुल बग़ल वाली सीट पर 598 वोट मिले। यानी इलाक़े का डर और मतदाताओं का जोड़ कितनी अलग चीज़ें हैं, यह रिकॉर्ड टिप्पणी के बिना छाप देता है।
नवंबर 2010 में उम्र 60 लिखने का मतलब जन्म 1949 या 1950 के आसपास, और अक्तूबर 2025 में 75 या 76। यही हिसाब है जिसके दम पर यह पेज अख़बारों के दो आंकड़ों को एक ज़िंदगी मानता है और बारह का शपथ पत्र उसी का मानता है। यही हिसाब बताता है कि 598 वोट पाने वाला वह उम्मीदवार अपनी जमा राशि खो देता है, क्योंकि वैध वोटों के छठे हिस्से से यह बहुत नीचे है।
अपने शपथ पत्र में उन्होंने अपने बारे में क्या लिखा
2010 का शपथ पत्र एकमात्र ऐसा कागज़ है जिसमें उनके बारे में सब कुछ अपने हाथ से भरा है, और वह माईनेटा अभिलेख से पढ़ा गया है। उसमें पिता का नाम प्रसदी यादव भरा है। शिक्षा में '8वीं पास' लिखा है और श्रेणी में 'मिडिल'। कुल संपत्ति अठारह लाख रुपये, यानी 18,00,000, घोषित है और देनदारी के हर क़तार में 'शून्य'। 2010 में अठारह लाख, पटना के नामी बाज़ारों से रंगदारी वसूलने का आरोप लगने वाले आदमी के लिए, या तो बहुत मामूली घोषणा है या बहुत अधूरी, और इस डेस्क के पास बताने का कोई तरीक़ा नहीं कि कौन-सी। यह उनकी अपनी शपथ-भरत है और इसी तरह दर्ज है।
उसी शपथ पत्र का आपराधिक हिस्सा इस पूरी फ़ाइल में उनके पुलिस-रिकॉर्ड की सबसे भरी सूची है। उसमें ग्यारह आपराधिक मामले लिखे हैं। चार दफ़ा 302 के तहत, यानी हत्या। तीन दफ़ा 307 के, यानी हत्या की कोशिश। पांच दफ़ा 34 के, यानी सामान्य इरादे की धारा, जो दूसरी धाराओं के साथ चलती है और अकेली खड़ी नहीं होती। दो दफ़ा 323 के, यानी मर्ज़ की ग़ैर-इरादी क्षति पहुँचाना। एक-एक मामले दफ़ा 379 के यानी चोरी, 364 के यानी अपहरण, 383 के यानी डराकर वसूली की तैयारी, 467 के यानी कीमती कागज़ गढ़ना, 420 के यानी धोखाधड़ी, 448 के यानी चोट पहुँचाने की तैयारी के साथ घर में घुसना, 406 के यानी आपराधिक विश्वासघात, 435 के यानी आग लगाकर नुकसान और 143 के यानी ग़ैर-क़ानूनी भीड़। दो मुक़दमा संख्या भी छपी हैं: 1019A वर्ष 1986 और 517 वर्ष 1991। इतना सब लिखने के बाद सवाल यह है कि कितनों में सज़ा हुई, और जवाब तीन शब्दों में है: कोई मामला नहीं।
ये आंकड़े 2010 में एक उम्मीदवार ने रिटर्निंग ऑफ़िसर से कहे हैं, और पूरे पेज पर इन्हें घोषणा ही कहा गया है। ये दोषसिद्धि के फ़ैसले नहीं हैं, और पढ़ी गई सामग्री में किसी अदालत ने इन्हें इनमें से किसी मामले में दोषी नहीं ठहराया।
बाद के आंकड़े अलग हैं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने मौत के दिन पटना के ग्रामीण पुलिस अधीक्षक विक्रम सिहाग के हवाले से लिखा कि दुलारचंद पर आठ मामले दर्ज हैं, जिनमें हत्या, चोरी के साथ-साथ आर्म्स एक्ट के उल्लंघन भी शामिल हैं। हिंदू ने पटना पुलिस के प्रेस रिलीज़ के हवाले से लिखा कि उन पर कई हत्या और आर्म्स एक्ट के मामले हैं। दोनों अपने-अपनी तारीख़ और अपनी-अपनी गिनती की परिभाषा से कम हैं, जो स्वाभाविक है, और यह पेज तीनों रखता है।
दो संरक्षण
एक बात पर सब स्रोत मानते हैं कि वह कभी न कभी सत्ता से जुड़े थे, और दिलचस्प बहस इस बात पर है कि किस सत्ता से।
टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट ने उन्हें उस दशक के प्रभावशाली दौर में राजद के सरगना लालू प्रसाद का क़रीबी हमराही लिखा, और जोड़ा कि बाद में वे प्रशांत किशोर की जनसुराज में चले गए और यादव-बहुल इलाक़े में अपनी पकड़ वहीं इस्तेमाल करते रहे। हिंदू की रिपोर्ट और इंडियन एक्सप्रेस दोनों उन्हें मौत के दिन पुराने राजद के नेता कहते हैं। बीबीसी हिंदी सबसे सँभली बात कहता है: बाद के दिनों में वे लालू प्रसाद यादव से दूर हुए, मगर फिर राजद के नज़दीक भी आ गए, और हाल के दिनों तक वे बार-बार यही दोहराते रहे कि बिहार के मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव को बनना चाहिए। बीबीसी उसी में सवाल भी उठा देता है कि जो आदमी यह कहता हो, वह जनसुराज का प्रचार क्यों कर रहा था, और जवाब नहीं देता।
नीतीश कुमार वाली तरफ़ एक ही स्रोत वाला बयान है, और वह बीबीसी में एक राजद नेता ने नाम न छापने की शर्त पर दिया। उस बयान का मतलब यह है कि जब नीतीश कुमार 1990 में बारह से लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे, तब उन्होंने दुलारचंद से मदद मांगी; कि पिछड़ों और अति पिछड़ों पर उनका बहुत प्रभाव था; कि वे लोगों की मदद पैसों से करते थे; और कि तारतर में हुए एक कार्यक्रम में नीतीश कुमार ने उन्हें बुलाया, और उसी कार्यक्रम से वे मोकामा की राजनीति में एक नए नाम के तौर पर जुड़ गए। नीतीश कुमार 1990 में बारह संसदीय सीट से खड़े हुए थे ही, जो जिस विधानसभा क्षेत्र में बाद में इन्हें खड़ा दिखाया गया, उसके बग़ल का ब्लॉक है, और यह डेस्क ने नेता की याद पर भरोसा छोड़कर नतीजे के कागज़ से जोड़ पढ़ा। बीबीसी यह भी लिखता है कि 1991 में बारह में हुए लोकसभा उपचुनाव में लालू प्रसाद यादव ने दुलारचंद को सार्वजनिक तौर पर सम्मानित किया।
दोनों बयानों का नतीजा यही है कि चुनावी राजनीति में उनका प्रवेश उन्हीं दो आदमियों की कृपा से हुआ, जिन्होंने उसके बाद बरसों तक बिहार की सरकार पर क़ब्ज़ा रखा, और कि वे पैंतीस साल उसी व्यवस्था के अंदर रहे और एक बार भी सीट नहीं जीते।
2025: सीट, उम्मीदवार, और वो वहां क्या कर रहे थे
मोकामा पटना ज़िले की चौदह विधानसभा सीटों में से एक है और गंगा के दक्षिण किनारे बसती है। हिंदू ने 2025 के तीन मुख्य उम्मीदवार गिनाए हैं, और यही तीनों उस मौत की वजह बने। जनता दल (यूनाइटेड) ने अनंत सिंह को खड़ा किया, जो इलाक़े में छोटे सरकार के नाम से मशहूर हैं और दिवंगत दिलीप सिंह के भाई हैं। राजद ने वीणा देवी को टिकट दिया, जो बाहुबली सूरजभान सिंह की पत्नी हैं; सूरजभान ने 2000 में यह सीट दिलीप सिंह से छीनी थी, बृज बिहारी हत्या के मामले में 2014 में दोषी ठहराए गए और बाद में उसी मामले में बरी हुए। जनसुराज ने पीयूष प्रियदर्शी को खड़ा किया, जो बांका के रहने वाले तीस साल के धानुक हैं और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ़ सोशल साइंसेज़ से सामाजिक कार्य में स्नातकोत्तर किया है। बीबीसी कहता है कि उनका नाम मोकामा टाल में पहली बार 2022 में सुनाई दिया, जब उन्होंने वहां का विधानसभा उपचुनाव लड़ने की घोषणा की, और कि उसके बाद उन्होंने एक लोकसभा चुनाव भी लड़ा। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट कहती है कि 2020 का विधानसभा चुनाव वे निर्दलीय लड़ चुके थे।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने यह भी लिखा कि उस टिकट को लेकर दुलारचंद क्या कर रहे थे, और यही इस कहानी का साफ़ कारण है। वे चाहते थे कि राजद मोकामा की टिकट प्रियदर्शी को दे। राजद ने आख़िरी वक़्त में मना कर दिया और वीणा देवी को उम्मीदवार घोषित कर दिया। तो वे जनसुराज के पक्ष में घूमे, उसी दलदल में, जहाँ यादव वोटों पर उनका दावा क़रीब 40 हज़ार मतदाताओं का है। इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि वे प्रियदर्शी का प्रचार कर रहे थे। हिंदू ने लिखा कि वे कथित रूप से जनसुराज के उम्मीदवार का समर्थन कर रहे थे। प्रशांत किशोर ने ख़ुद एएनआई से कहा, और टाइम्स ऑफ इंडिया ने 31 अक्तूबर को छपा, कि 'वे जनसुराज के आधिकारिक सदस्य नहीं हैं। वे पीयूष जी का समर्थन कर रहे थे, जो जनसुराज के आधिकारिक उम्मीदवार हैं'। किशोर ने आगे कहा कि यह हत्या वही दिखाती है जिसको लोग जंगलराज कहते आ रहे हैं, कि हिंसा का लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं, और कि किसी की हत्या का ज़िम्मा प्रशासन का और व्यवस्था व क़ानून-शृंखला के हिफ़ाज़तदारों का है, और यह उनकी नाकामी है।
बीबीसी की उसी दिन की रिपोर्ट एक ऐसा ब्योरा जोड़ती है जो इसे दलों की लड़ाई से ख़ानदानों की लड़ाई बना देता है। दुलारचंद का एक पोता उनके साथ राह पर था, और बाद में शिकायत उसी पोते ने लिखवाई। यह सीट दो ख़ानदानों और एक जातीय जोड़ के बीच पैंतीस साल से बँटी थी। 2025 में जो बदला, वह यह था कि एक पुराने यादव दलाल ने तय किया कि अपनी पहुँच एक धानुक शिक्षक के बेटे पर ख़र्च करेगा और अपने पुराने संरक्षकों के उम्मीदवार को पीछे रख देगा, और मतदान के पहले चरण, यानी 6 नवंबर, से तीन दिन पहले वह मरा पड़ा था।
30 अक्तूबर 2025
सबसे ज़्यादा वज़न सरकारी बयान का है, और वह पटना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक के कार्यालय ने जारी किया, जिसे बीबीसी हिंदी ने लंबा उद्धृत किया। उसमें कहा गया कि साढ़े तीन बजे भदौर के थानाध्यक्ष को सूचना मिली कि अनंत सिंह के काफ़िले पर हमला हुआ है, और काफ़िले तक पहुँचने पर पता चला कि हमला जनसुराज के समर्थकों ने किया। इसी बीच, बयान में आगे है, घोसवरी के थानाध्यक्ष को भी सूचना मिली कि तारतर गाँव के पास दो पक्षों में मारपीट हुई। जब पुलिस वहां पहुँची तो दो-तीन चारपहिया गाड़ियों का शीशा टूटा हुआ था और एक आदमी का शव गाड़ी में था। उसकी पहचान दुलारचंद यादव के तौर पर की गई। बयान में कहा गया कि पुलिस आसपास के सीसीटीवी कैमरे खंगाल रही है, कि एफ़एसएल की टीम मौक़े पर है, कि मौत संदेहास्पद है, और कि कारण पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट, कैमरा फ़ुटेज और जांच में जुटे सबूतों के विश्लेषण के बाद ही साफ़ हो पाएगा।
उस सरकारी बयान में दो बातें पकड़ में रखने लायक हैं। पहली यह कि पुलिस ने शुरू में पूरी बात इस तरह पेश की कि अनंत सिंह के काफ़िले पर हमला हुआ, यानी ठीक वही आकार जो अनंत सिंह के अपने बयान को चाहिए। दूसरी यह कि शव एक ऐसी गाड़ी के अंदर मिला जिसका शीशा टूटा हुआ था, यानी ठीक वही आकार जो कुचलने की कहानी पर बैठता है।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने उसी दिन ग्रामीण पुलिस अधीक्षक विक्रम सिहाग के हवाले से लिखा कि झगड़ा प्रियदर्शी और सिंह के समर्थकों में बसावनचक गाँव के पास घोसवरी थाना क्षेत्र में एक तीखी बहस से शुरू हुआ, कि दोनों पक्षों ने एक-दूसरे पर हमला किया, कि अफ़रातफ़ी में एक आदमी की टखी में गोली लगी, और कि एक पक्ष ने कहा कि दुलारचंद को गोली मारी गई और फिर सिंह के समर्थकों की गाड़ी से कुचलवाया गया। सिहाग ने कहा, 'प्रथम दृष्टया ऐसा लगता है कि गाड़ी चढ़ने से उनकी मौत हुई'। उन्होंने दूसरे पक्ष के पाँच-सात घायल और दस-बारह से ज़्यादा तोड़ी गई गाड़ियाँ गिनाईं, और यह भी कहा कि अभी कोई लिखित शिकायत नहीं आई। यानी आख़िरी क़िस्ता उस दिन के हिसाब से मायने रखता है: पुलिस हत्या के दिन मीडिया से बात कर चुकी थी, उससे पहले कि कोई प्राथमिकी लिखी गई हो।
जनसुराज का अपना बयान टाइम्स ऑफ इंडिया को पार्टी नेताओं ने दिया: उनका काफ़िला सिंह से जुड़ी एक गाड़ी के पीछे जा रहा था कि अचानक लाठी-रॉड लिए बीस-पच्चीस आदमियों के एक समूह ने हमला कर दिया, और अफ़रातफ़ी में दुलारचंद की गोली मारकर हत्या हो गई। प्रियदर्शी ने एक वीडियो में कहा कि सिंह के समर्थकों ने उनके काफ़िले पर हमला किया, कि वे लोग हडबड़ी मचा रहे हैं, और कि प्रशासन ने कुछ नहीं किया। एक सीनियर पार्टी पदाधिकारी ने अख़बार से कहा, 'दुलारचंदजी इस जगह पर हमारे आंदोलन का खंभे थे। यह दिनदहाड़े का जंगलराज है'।
अनंत सिंह का बयान उसी अख़बार में कुछ और था: यह हमला सूरजभान सिंह की साज़िश है, जिनकी पत्नी तब उनकी ख़िलाफ़ उसी सीट से चुनाव लड़ रही थीं। उन्होंने कहा, 'यह सब सूरजभान का काम है, चुनाव से पहले बदनाम करने की गंदी चाल'। घटना का ब्योरा उन्होंने सबसे अलग दिया। 'हम लोगों से मिल रहे थे और वोट मांग रहे थे। वे लोग मुरदाबाद का नारा लगाने लगे। मैंने अपने समर्थकों को जवाब न देने को कहा और आगे बढ़ गया। वे लोग टकराह के लिए तैयार थे और हमारी गाड़ियों पर हमला कर दिया। मेरे समर्थकों की गाड़ियाँ तोड़ी गईं'। हिंदू ने उन्हें और भी सीधे कहते लिखा: उनका काफ़िला जनसुराज प्रत्याशी पियूष जी के प्रचार-वाहनों से क्रॉस हुआ, तब दुलारचंद यादव और उनके आदमियों ने उनके काफ़िले की कम से कम दस गाड़ियाँ हड़प लीं और उनके आदमियों पर हमला किया, और फिर यह घटना हो गई। हत्या से एक दिन पहले उन्होंने मोकामा शहर में सैकड़ों समर्थकों के साथ रोड शो किया था, और एक दिन बाद वे मुख्य आरोपी थे।
शिकायत, जब लिखी गई, तो किसी भी अख़बारी बयान से अलग किस्म का कागज़ थी। बीबीसी हिंदी ने घोसवरी थाने में दर्ज प्राथमिकी का ब्योरा यूं दिया: रास्ते में अनंत सिंह मिले और दादा को गाली देने लगे; जब दादा ने गाली देने से मना किया तो राजवीर सिंह और कर्मवीर सिंह ने दादा को गाड़ी से बाहर खींच लिया; बाहर आते ही अनंत सिंह ने पिस्तौल निकाली और दादा के बाएं पैर की एड़ी में मारी, और दादा गिर गए; उसके बाद छोटन सिंह ने लोहे की रॉड से मारा और थार गाड़ी से उन्हें कुचल दिया। बीबीसी ने साथ में पोते का यह बयान भी छपा कि दादा तो सिर्फ़ हंगामा शांत कराने गए थे, मगर इन लोगों ने उन्हें मार दिया। हिंदू ने लिखा कि अनंत सिंह समेत पांच नाम दर्ज हैं, और कि घोसवरी व भदौर में दर्ज कम से कम तीन प्राथमिकियों में एक ने सिंह और चार अन्य का नाम लिया। पोते की मांग, जो टाइम्स ऑफ इंडिया ने 2 नवंबर को छपा, यह थी कि पांचों आरोपियों को गिरफ़्तार कर मृत्युदंड दिलाया जाए और परिवार को सुरक्षा मिले। टाइम्स ने उन्हें यूं उद्धृत किया: 'जब तक पांचों आरोपी गिरफ़्तार होकर सज़ा नहीं पाते, तब तक हम ब्रह्मभोज नहीं करेंगे'।
पोस्टमॉर्टम, और मौत की चार बयानबाज़ियाँ
चिकित्सा-निष्कर्ष इस केस की सबसे स्थिर चीज़ है और सबके लिए सबसे असुविधाजनक। पटना पुलिस को सौंपी गई रिपोर्ट, जिसे हिंदू ने उद्धृत किया, यूं लिखी गई: 'दुलारचंद यादव की मौत का कारण हृदय और फेफड़ों को कठोर व कुंद वस्तु से लगी चोट के कारण हुए शॉक से हृदय-श्वसन विफलता है'। उसी रिपोर्ट में, उसी लेख के मुताबिक, यह भी लिखा था कि दुलारचंद के टखी के पास गोली लगी थी, मगर मौत का कारण गोली नहीं थी।
बिहार के पुलिस महानिदेशक विनय कुमार ने 2 नवंबर को पटना में प्रेस कॉन्फ़्रेंस में निष्कर्ष दिया। उनका बयान यूं छपा: मृतक की टांग पर गोली का निशान मिला, मगर वह मौत का कारण नहीं थी; प्राथमिक कारण हृदय और श्वास का रुकना था। उन्होंने बताया कि अपराध अनुसंधान विभाग की टीम बनाई गई है, कि प्रारंभिक पाता यह सुझाती है कि झगड़े में गाड़ी दुलारचंद पर चढ़ी हो सकती है, और कि यह जानबूझकर थी या दुर्घटनावश, यह जांच में तय होगा। उन्होंने कहा कि गवाह बहुत कम हैं, कि मौक़े की पुन:पड़ताल हो रही है, और कि जिस हथियार से टांग में गोली चलाई गई, वह अब तक बरामद नहीं हुआ। 'इस मामले में किसी को नहीं बख्शा जाएगा', उन्होंने कहा। और घटना का ब्योरा देते हुए उन्होंने सबसे अलग बात कही: दो उम्मीदवारों के समर्थक गाड़ियाँ लिए हुए एक-दूसरे से भिड़े, भारी पथराव हुआ, और उसके नतीजे में चोटें आईं और दुलारचंद यादव की मौत हो गई।
हिंदू ने उल्टा रास्ता पकड़ा और पाथोलॉजी उसी आदमी से निकालवाई जिसने पोस्टमॉर्टम किया। बारह के सरकारी अस्पताल में तीन डॉक्टरों की टीम में शामिल अजय कुमार नामक चिकित्सक ने हिंदू को बताया कि दुलारचंद की मौत छाती और सिर पर कुंद चोट से हृदय-फेफड़ा विफलता से हुई। उन्होंने कहा, 'आप समझ सकते हैं कि उनकी मौत फेफड़ा फटने और पसलियाँ कई जगह टूटने से भीतर खून बहने से हुई'। फटे फेफड़े, टूटी पसलियाँ, भीतर खून। यह कुचली या रौंदी गई लाश का नतीजा है, और पुलिस के उस बयान से मेल खाता है कि शव टूटे शीशे वाली गाड़ी के अंदर मिला।
हिंदुस्तान टाइम्स ने अपनी ज़मानत रिपोर्ट में क्रम इस तरह जोड़ा: दुलारचंद को कथित रूप से गोली मारी गई और फिर गाड़ी चढ़ाई गई, और बाद के पोस्टमॉर्टम में हृदय-श्वसन विफलता निकली। इंडियन एक्सप्रेस ने उसी सामग्री को एक ऐसे वाक्य में रखा जो ठहरकर पढ़ने लायक है, क्योंकि वह कहता है कि सबूत क्या सहारा देता है और क्या नहीं: शुरू की रिपोर्टों में कहा गया कि दुलारचंद की गोली मारकर हत्या हुई, पोस्टमॉर्टम में शॉक से हुई हृदय-श्वसन विफलता निकली, जो हृदय व फेफड़ों पर कठोर व कुंद वस्तु की चोट से थी, और कुंद चोट का यह नमूना उस आरोप से मेल खाता है कि टांग में गोली लगने से वह नहीं मरे थे, तो उनके ऊपर गाड़ी चढ़ा दी गई।
यानी एक मौत के चार बयान हैं, और यह पेज कोई चुनेगा नहीं। गोली और फिर गाड़ी से कुचलवाया, जो पोते की शिकायत है और समर्थकों का आरोप। कुचलना, जो ग्रामीण पुलिस अधीक्षक की प्रथम दृष्ट्या राय है और पोस्टमॉर्टम सरजन की पाथोलॉजी। पथराव, जो पुलिस महानिदेशक ने कहा। लाठी-रॉड लिए पच्चीस आदमियों की घात में गोली, जो जनसुराज का बयान है। इन सब में एक बात साझा है: बाएं टखी पर गोली का एक निशान, और एक छाती जो कुचल दी गई थी। जिस बंदूक से गोली चली, वह इस डेस्क ने पढ़ी गई सामग्री में कभी नहीं मिली।
प्रशासन ने आगे क्या किया
प्रशासनिक जवाब तेज़ था और ठीक-ठीक पते पर। शनिवार को पटना के ग्रामीण पुलिस अधीक्षक ने दो थानाध्यक्षों के निलंबन की पुष्टि की: घोसवरी के मधुसूदन कुमार और भदौर के रवी रंजन। हिंदू ने दोनों को कर्तव्य में लापरवाही के आरोप पर निलंबित लिखा। दोनों वही दो थाने थे जिनके अधिकारियों को एक ही लड़ाई की सूचना मिनटों के फ़ासले पर मिली, और लापरवाही का मतलब व्यावहारिक रूप में यही है।
चुनाव आयोग ने उसके बाद उस सीट का चुनाव चलाने वाले अफ़सरों पर हाथ डाला। शनिवार शाम जारी आदेश, जिसे बीबीसी हिंदी ने छपा, बारह-1 के उपमंडल पदाधिकारी चंदन कुमार को हटाता है, जो मोकामा विधानसभा सीट के रिटर्निंग ऑफ़िसर भी थे, और उनकी जगह पटना नगर निगम के अतिरिक्त नगर आयुक्त आशीष कुमार को भेजता है। आदेश कहता है कि बारह के उपमंडल पुलिस पदाधिकारी राकेश कुमार की जगह पटना सीआईडी के डीएसपी आनंद कुमार सिंह को भेजा जाए। यह भी कहता है कि बारह-2 के उपमंडल पुलिस पदाधिकारी की जगह आतंक-विरोधी इकाई के डीएसपी आयुष श्रीवास्तव को भेजा जाए, और कि उस पद पर बैठे अभिषेक सिंह को तुरंत निलंबित किया जा सकता है। आयोग ने पटना (ग्रामीण) के पुलिस अधीक्षक विक्रम सिहाग के तबादले का आदेश दिया और उनके बदले नामों की सूची मांगी। हटाए गए तीनों अफ़सरों के ख़िलाफ़ अनुशासनिक कार्रवाई की मंज़ूरी भी दी, और कार्रवाई की आख़िरी हद तय की: 2 नवंबर को दोपहर बारह बजे तक। उसी दिन आयोग ने बिहार के पुलिस महानिदेशक से इस हत्या पर रिपोर्ट मांगी, जैसा टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा।
एक छोटा उपाय दर्ज करने लायक है, क्योंकि वह चल रहे चुनाव का असली हाल बताता है। पुलिस ने कहा कि मोकामा विधानसभा क्षेत्र में आदर्श आचार संहिता का पालन सुनिश्चित करने के लिए तीन मुख्य उम्मीदवारों में से हर एक के साथ एक-एक मजिस्ट्रेट, पुलिस अधिकारी, सशस्त्र बल और वीडियोग्राफर रखा गया। काफ़िले चारों तरफ़ से कैमरे पर थे और एक आदमी बीच सड़क मारा गया।
गिरफ़्तारी, रिमांड और 19 मार्च 2026 का ज़मानत आदेश
अनंत सिंह को 1 और 2 नवंबर की दरम्यानी रात गिरफ़्तार किया गया। हिंदू ने जगह बारह का मार्केट कॉम्प्लेक्स लिखा, मोकामा से क़रीब पंद्रह किलोमीटर दूर, और लिखा कि पुलिस की एक टुकड़ी ने उन्हें और उनके दो साथियों को हिरासत में लिया और पटना ले जाते वक़्त उनके समर्थकों की महंगी गाड़ियों का काफ़िला पीछे-पीछे चला। बीबीसी हिंदी ने लिखा कि पटना के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक कार्तिकेय शर्मा ने शनिवार देर रात गिरफ़्तारी की जानकारी दी, कि गिरफ़्तारी बारह इलाक़े के बेढना गाँव से हुई, और कि शर्मा ने कहा कि यह सोची-समझी साज़िश में हुआ क़तल है और कि अनंत सिंह हत्या के समय मौक़े पर मौजूद थे। इंडियन एक्सप्रेस, टाइम्स ऑफ इंडिया और हिंदुस्तान टाइम्स सब गिरफ़्तारी की तारीख़ 1 नवंबर की रात लिखते हैं; टाइम्स की एक रिपोर्ट में 'रविवार सुबह' भी छपा। जगह पर कागज़ में दो नाम हैं और समय पर रात व सुबह; दोनों छापे गए।
दो साथी उनके साथ पकड़े गए, और उनमें से एक का नाम पढ़ी गई प्रतों में अस्थिर है। चारों स्रोत मणिकांत ठाकुर पर मानते हैं। राजेश राम हिंदू में है और रंजीत राम टाइम्स ऑफ इंडिया, इंडियन एक्सप्रेस व एएनआई की रिपोर्ट में। अदालत का कागज़, जो इस डेस्क ने नहीं देखा, यह तय कर सकता था।
कार्तिकेय शर्मा का गिरफ़्तारी के समय का बयान छोटा था और यही इस केस में किसी पुलिस अधिकारी की कही सबसे मज़बूत बात है। उन्होंने कहा: 'सोची-समझी साज़िश के तहत दुलारचंद की हत्या की गई है। मर्डर के समय अनंत सिंह भी मौक़े पर मौजूद थे। पुलिस हत्या में शामिल किसी शख़्स को नहीं छोड़ेगी'। हिंदू ने लिखा कि पटना की एक स्थानीय अदालत ने 2 नवंबर रविवार को सिंह और उनके दो साथियों को दो हफ़्तों की न्यायिक हिरासत भेजा, और कि उन्हें मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के समक्ष पेश किया गया। सुनवाई से पहले सिंह ने सोशल मीडिया पर लिखा: 'सत्यमेव जयते। मुझे मोकामा के लोगों पर पूरा भरोसा है, तो अब मोकामा के लोग चुनाव लड़ेंगे'। उन्हें पटना की बेउर जेल भेजा गया।
दो और गिरफ़्तारियाँ हुईं, आयोग ने रिपोर्ट मांगी, और मतदान होता रहा। सिंह ने जेल से चुनाव लड़ा। 3 फ़रवरी 2026 को हिंदुस्तान टाइम्स ने लिखा कि उन्हें जेल की गाड़ी में विधानसभा लाया गया और पैरोल पर जनता दल (यूनाइटेड) के विधायक के तौर पर शपथ दिलवाई गई, कि शपथ के बाद वे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चरण छूते रहे, जिन्हें वह अख़बार उनका राजनीतिक गुरु कहता है, और कि इसके बाद वे फिर जेल की गाड़ी में लौट गए। उन्होंने बाहर पत्रकारों से कुछ शब्द कहे और प्रतिपक्ष के नेता पर हमला किया कि तेजस्वी यादव की राजनीति की साख ख़त्म हो गई है और कि अगली बार उन्हें किसी और दल का निशान लेकर चुनाव लड़ना पड़ सकता है।
ज़मानत गुरुवार 19 मार्च 2026 को मिली। पटना उच्च न्यायालय ने दुलारचंद यादव की हत्या के मामले में अनंत सिंह को ज़मानत दी। न्यायाधीश रुद्र प्रकाश मिश्र ने पंद्रह हज़ार रुपये के मुचलकें पर चार शर्तों के साथ आदेश पास किया, जिनमें दो का मर्म हिंदुस्तान टाइम्स ने दिया: मुक़दमे की हर तय तारीख़ पर हाज़िर होना, और बिना पर्याप्त कारण लगाए लगातार दो तारीख़ें नहीं छोड़ना। आदेश के अपने शब्दों में: 'याचिकार अभियोजन के सबूत से छेड़छाड़ नहीं करेगा और न मुक़दमे के दौरान किसी गवाह को प्रभावित या भड़काएगा। ऊपर लिखी शर्तों का उल्लंघन होने पर ट्रायल कोर्ट याचिकार के मुचलक़ा रद्द करने के लिए स्वतंत्र होगी'। इंडियन एक्सप्रेस उसी चेतावनी को साफ़-साफ़ दी गई कहता है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा कि वे शुक्रवार को बेउर जेल से छूटने की संभावना रखते हैं।
वह सुनवाई इस केस में सबसे काम की चीज़ है, क्योंकि वह दुलारचंद को मारने वाले आदमी के बारे में दोनों पक्षों की दलीलें एक जगह रख देती है। राज्य के वक़िल ने ज़मानत का विरोध किया और कहा कि याचिकार पर 27 आपराधिक मामले दर्ज हैं। सिंह की तरफ़ से वक़िल ने कहा कि किसी गवाह ने उनके ख़िलाफ़ कुछ नहीं कहा और कि घटनास्थल से कोई कारतूस या खाली कारतूस बरामद नहीं हुआ। उन्होंने यह भी माना कि उनके मुवक्कल 51 मामलों में आरोपी हैं जिनमें या तो वे बरी हुए हैं या पुलिस ने अंतिम रिपोर्ट दे दी है, यानी बिना आरोप लगाए मामला बंद कर दिया है। उनका कहना था कि कई प्राथमिकियाँ राजनीतिक रंजिश से बनी हैं। मिश्र की अदालत ने एक क़तल के मामले में पंद्रह हज़ार रुपये पर आदमी छोड़ दिया, गिरफ़्तारी के साढ़े पांच महीने बाद, और मुक़दमा आगे चलने को छोड़कर।
नतीजा, और एक हत्या का वोटों पर असर
अनंत सिंह ने नवंबर 2025 का मोकामा चुनाव न्यायिक हिरासत में रहकर जीता। टाइम्स ऑफ इंडिया ने हिसाब दिया: वीणा देवी पर 28,206 वोटों का अंतर, जिनके 63,210 वोट रहे, यानी सिंह के 91,416। हिंदुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस दोनों बाईस हज़ार से ज़्यादा का अंतर लिखते हैं और राजद की उम्मीदवार को हिंदुस्तान टाइम्स में वीणा सिंह तथा टाइम्स ऑफ इंडिया व भारतीय चैनलों में वीणा देवी कहा जाता है। हिंदू की चुनाव-पूर्व रिपोर्ट में वे सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी के तौर पर सामने हैं, तो यह पेज दोनों नामों को एक ही औरत मानता है और छापता है कि किस अख़बार ने क्या लिखा।
बिहार का पूरा नतीजा, जो टाइम्स ऑफ इंडिया ने रिपोर्ट किया, एनडीए को 243 में 202 सीटें दे गया और महागठबंधन को 35, जो राज्य में सत्तारूढ़ गठबंधन का लगातार दूसरा दोहरे अंक का प्रदर्शन था; पहली बार 2010 में 206 सीटें आई थीं। मोकामा उस छलांग में एक सीट थी और 75 साल के एक आदमी की हत्या ने उसे नहीं रोका। यह सीट 1990 से अनंत सिंह के ख़ानदान के पास रही, एक बार को छोड़कर, और वह एक बार 2000 का था जब सूरजभान सिंह ने दिलीप सिंह से सीट ली; हिंदू, टाइम्स ऑफ इंडिया और बीबीसी तीनों इस दौरे को लगभग एक ही वाक्य में कहते हैं। 2022 का उपचुनाव अनंत सिंह ने ही करवाया: उनकी अयोग्यता ग़ैर-क़ानूनी गतिविधि रोकथाम क़ानून के एक मामले में सज़ा पाने से आई, और उस उपचुनाव में उनकी पत्नी नीलम देवी ने राजद के टिकट पर जीत हासिल की, जो 2024 में जनता दल (यूनाइटेड) में चली गईं। बीबीसी ने लिखा कि वे उससे पहले अगस्त 2024 में आर्म्स एक्ट के एक मामले में बरी होकर जेल से बाहर आ चुके थे, और इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा कि जिस यूएपीए मामले ने सीट छीनी, उसमें उच्च न्यायालय ने बाद में उन्हें बरी कर दिया। हिंदुस्तान टाइम्स ने उनके शपथ पत्र के हवाले से उनकी संपत्ति 37.88 करोड़ रुपये लिखी।
दोनों शपथ पत्रों को कागज़ की तरह साथ रखकर पढ़िए। 2010 में बारह के एक उम्मीदवार ने अठारह लाख रुपये की संपत्ति, कोई देनदारी नहीं, ग्यारह आपराधिक मामले और कोई सज़ा नहीं घोषित की, और 598 वोट पाए। 2025 में उनके क़तल के आरोपी ने 37.88 करोड़ रुपये घोषित किए, गिनने वाले के हिसाब से 27 या 51 मामले झेलते हुए, जेल की सेल से 91,416 वोट लिए, और बीस साल से चल रही सरकार के सहयोगी बने मंत्री के बराबर बैठे आदमी बन गए। यह तुलना बिहार की राजनीतिक बाज़ार पर इस पेज की पूरी दलील है, और वह सिर्फ़ उन दो आदमियों के अपने-अपने भरे हुए आंकड़ों से बनती है।
मोकामा का जातीय जोड़
इस हत्या की हर गंभीर रिपोर्ट एक पैराग्राफ़ वोट और जाति के आंकड़ों पर पहुँचती है, क्योंकि उनके बिना इसमें कुछ भी समझ नहीं आता। टाइम्स ऑफ इंडिया की 1 नवंबर की रिपोर्ट सबसे भरी हुई है। इस सीट पर भूमिहार सबसे बड़ी जाति हैं, क़रीब 65 हज़ार मतदाता, और सिंह ख़ानदान व सूरजभान सिंह दोनों भूमिहार हैं। धानुक क़रीब 45 हज़ार हैं, यादव क़रीब 40 हज़ार, साथ में राजपूत और पसवान हर एक 10 हज़ार के आसपास। प्रियदर्शी धानुक हैं, और अख़बार ने लिखा कि इस जोड़ पर वे कम-से-कम हिसाब में एक ताक़त बन चुके थे। उसी रिपोर्ट में एक मिसाल भी है: इस सीट पर एक धानुक, बिशुन धारी लाल, ने 1967 में रिपब्लिकन पार्टी के टिकट पर जीता था, और 2025 के धानुक उम्मीदवार के पास यही एक पुराना उदाहरण था।
उस रिपोर्ट ने उसी रात के गुस्से का एक बयान भी दर्ज किया, एक रहने वाले के शब्दों में। मरण्ची गाँव के मृत्युंजय कुमार ने टाइम्स ऑफ इंडिया से कहा कि दुलारचंद इस बात से नाख़ुश थे कि प्रियदर्शी को राजद की टिकट नहीं मिली। और सत्तारूढ़ दल का जवाब भी उसी अख़बार में उसके प्रवक्ता नीरज कुमार के शब्दों में दर्ज है: 'हम इस घटना की सख़्त निंदा करते हैं। इसमें शामिल गुंडों को कोई भी कीमत चुकानी पड़े, सज़ा मिलनी चाहिए। पुलिस जांच कर रही है और एफ़एसएल की टीम मौक़े पर पहुँच गई है'।
दो पुराने राजनेताओं ने बीबीसी से उसी तरीक़े पर बात की जो इस सीट का ढंग दिखाता है। श्याम सुंदर सिंह वीरज, जो मोकामा से दो बार विधायक और तीन बार मंत्री रहे और 1990 में दिलीप सिंह से हारे थे, कहते हैं कि पूरे बिहार में हर पार्टी ने एक जननायक को हराने का एक ही तरीक़ा निकाला है, और वह यह कि उसके ख़िलाफ़ बाहुबली खड़ा कर दिया जाए, ताकि साफ़-सुथरी छवि वाला जीत ही न पाए। वे यह भी कहते हैं कि राज्य के बाक़ी हिस्सों में चुनाव से पहले लाइसेंसी हथियारों की गिनती होती है, मगर यहां प्रचार-प्रसार में भी लोग बंदूक लेकर घूम रहे हैं। एसासिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स के बिहार संयोजक राजीव कुमार ने माप दिया: 2015 में चुने गए विधायकों का 40 प्रतिशत और 2020 का 51 प्रतिशत गंभीर आपराधिक मामले लंबित रखे हुए था, और वे 2025 में इसका बढ़ना तय मानते हैं। उनके उसी बयान का आगे का हिस्सा इस हत्या की रिपोर्टिंग का पूरा विश्लेषण है: बाहुबली इसलिए ज़्यादा जीतते हैं क्योंकि उनके पास पैसा है, ताक़त है, और पूरी व्यवस्था में एक किस्म की सामाजिक मंज़ूरी भी; पहले पार्टियाँ इन्हें चुनती हैं, फिर जनता चुनती है।
जो बात तय नहीं हुई
इस कहानी में पांच सवाल ऐसे हैं जिनका जवाब इस डेस्क ने पढ़ी गई सामग्री में नहीं पाया, और उन्हें जैसी हैं वैसी लिख देना चाहिए।
पहला, गोली किसने चलाई। दूसरा, आख़िर मौत किससे हुई; दोनों ऊपर अनसुलझे छोड़े गए हैं। कागज़ में इस बात का कुछ भी नहीं कि गोली चलाने वाला कौन था। पुलिस महानिदेशक ने कहा कि हथियार नहीं मिला और यह तय करना कि गोली किसने चलाई, काम में है। पोते की शिकायत अनंत सिंह का नाम लेती है। उच्च न्यायालय ने मुक़दमे की सुनवाई आगे चलने को कहकर ज़मानत दे दी, यानी आख़िरी तारीख़ तक, जिस रिपोर्ट तक यह डेस्क पहुँचा, वह सवाल खुला था।
तीसरा, चार्जशीट दाख़िल हुई या नहीं। टाइम्स ऑफ इंडिया ने नवंबर 2025 में लिखा कि नहीं हुई। उसके बाद की कोई पुष्टि इस डेस्क को नहीं मिली, और कोई ट्रायल का नतीजा भी नहीं। यह पेज किसी भी नामज़द आदमी के ख़िलाफ़ कोई दोषसिद्धि नहीं बताता, और फ़ाइल की हर आपराधिक गिनती को या तो उम्मीदवार की अपनी घोषणा मानता है या दर्ज मामलों की पुलिस-गिनती, जो असल में यही मापती है।
चौथा, कितनी प्राथमिकियाँ हैं। हिंदू की पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट तीन कहती है। हिंदू की रिमांड रिपोर्ट कम से कम तीन कहती है, घोसवरी व भदौर दोनों में। बीबीसी एक दर्ज प्राथमिकी कहता है जिसमें पांच नाम हैं। टाइम्स की पोते वाली रिपोर्ट एक शिकायत कहती है जो पोते ने की और जिसमें सिंह व चार अन्य का नाम है। कोई भी चार, पांच या छह नहीं कहता, और यह पेज तीन या उससे ज़्यादा गिनता है।
पांचवा, राजनीति से पहले का आदमी। उनके बचपन, यादवों के अंदर उनकी जातीय जगह, उनकी शादी, उनके बच्चे, उनकी ज़मीन या उनके धंधे का कोई भरोसेमंद बयान नहीं मिलता। उनका अपना 2010 का शपथ पत्र निजी रिकॉर्ड के सबसे क़रीब है और वह एक फ़ॉर्म है। बीबीसी उनका गाँव तारतर देता है, और हत्या की जगह उसी रिपोर्ट में तारतर व बसावनचक के बीच की राह; यानी टाइम्स का बसावनचक, हिंदू का तारतर, हिंदुस्तान टाइम्स का भदौर थाने वाला तारतर और पोते की घोसवरी शिकायत, ये सब एक ही नदी-राह के चार निर्देशांक हैं। यह उनके इंसान के बारे में कही जा सकने वाली पूरी बात है, और इसीलिए इस पेज का आख़िरी हिस्सा है।
इस पेज को कैसे पढ़ें
दो श्रद्धांजलि उसे डकैत कहती हैं। एक उसे समाजसेवी कहती है, जो तेजस्वी यादव ने सरकार पर हमला करते हुए कहा। एक पार्टी पदाधिकारी उसे अपने आंदोलन का खंभे कहता है। पुलिस फ़ाइल ग्यारह मामले दर्ज करती है और कोई सज़ा नहीं। उसके पड़ोसी उसे पहलवान जी कहकर याद रखते हैं। उसने न रहने की सीट बारह में 598 वोट लिए, और उसकी मौत ने चार तबादले व दो निलंबन गिराए और बिहार में चुनाव पर देशभर की बहस का केंद्र बन गए। इनमें से कोई भी वर्णन उसका सारांश नहीं है और सब मिलकर रिकॉर्ड हैं।
इसलिए इस प्रोफ़ाइल की ईमानदार शकल एक दस्तावेज़-समस्या है। करीब 2010 से पहले सब यादें हैं, और वे यादें पत्रकारों की हैं, प्रतिद्वंद्वियों की हैं और एक नाम छिपाए पार्टी नेता की हैं। अक्तूबर 2025 के बाद सब दर्ज कागज़, पुलिस-विज्ञप्तियाँ और अदालती आदेश हैं, और वे आपस में गिरफ़्तारी की जगह पर, शिकायतों की गिनती पर, दो आरोपियों के नाम पर और एक मौत की कार्रवाई पर टकराते हैं। यह पेज टक्कर छापता है, क्योंकि टक्कर ही जानी गई बात है। जो संस्करण पढ़ने में चिकना लगेगा, वह इस डेस्क का गढ़ा हुआ होगा।
जिस बात पर शक नहीं, वह यही है कि एक 75 या 76 साल का आदमी, जो बरसों से विधानसभा की सीट पाने की कोशिश करता रहा और एक बार भी नहीं पा सका, एक चुनाव के दौरान एक दलदली राह पर उसके पैर में गोली लगी और उसे मार दिया गया। उसके क़तल के आरोपी ने छह दिन बाद 91,416 वोट लिए, जेल की गाड़ी से आकर विधानसभा में शपथ ली, और चलते मुक़दमे पर पंद्रह हज़ार रुपये के मुचलकें से छूट गए।