जीवनी और करियर का अवलोकन
संतोष यादव (जन्म 10 अक्टूबर 1967) एक भारतीय पर्वतारोही हैं, जिन्होंने विश्व के अन्वेषण-इतिहास में वह जगह लिखी जो आज तक कोई दूसरी महिला नहीं पा सकी: माउंट एवरेस्ट पर दो बार चढ़ने वाली पृथ्वी की पहली महिला। इसका एक और मतलब यह है कि दो अलग-अलग वर्षों में संसार की सर्वोच्च चोटी पर खड़े होने वाले पहले व्यक्ति वे बने; इस रिकॉर्ड में लिंग-भेद नहीं है। असाधारण बात चोटी की ऊँचाई से ज्यादा यह है कि वे कहाँ से शुरू हुईं। संतोष का पलना-बसना हरियाणा के धूल भरे, बर्फ़-रहित कस्बे नरनाल में हुआ, एक ऐसे परिवार में जिसका पहाड़ों से कोई लेना-देना नहीं था। उनके अपने कथन के अनुसार उन्होंने एक युवती के रूप में पर्वतारोहण-पाठ्यक्रम में नामांकन लेने के बाद ही पहली बार बर्फ़ देखी और उसे छुआ। इसी शून्य से वे आगे बढ़ीं: 1992 और फिर 1993 में एवरेस्ट, देश भर में नाम, साल 2000 में पद्म श्री, और चढ़ाइयों के बाद के वर्ष उसी संस्थान में शिक्षण तथा अभियानों का नेतृत्व। उन्होंने साहसिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी की वकालत भी की। यह प्रोफ़ाइल उनकी चढ़ाई-दर-चढ़ाई सार्वजनिक रिकॉर्ड को नामित स्रोतों से दर्ज करती है।
नरनाल का प्रारंभिक जीवन और बर्फ़ का पहला दर्शन
संतोष कुमारी यादव का जन्म 10 अक्टूबर 1967 को नरनाल में हुआ, जो तब हरियाणा का हिस्सा था और बाद में पुनर्गठित हरियाणा में रहा। उनका परिवार सादा था, शिक्षा को महत्व देता था, पर पहाड़ों से उसका कोई वास्ता नहीं था। उन्होंने इलाके में ही पढ़ाई की (हरियाणा के विश्वविद्यालयों से कला में स्नातक और स्नातकोत्तर, जिनमें साहित्य और शिक्षण की ओर झुकाव रहा) और 1980 के दशक के उत्तरार्ध में वैसा ही रास्ता चुन रही थीं जैसा छोटे कस्बे के भारतीय परिवार की शिक्षित बेटी से अपेक्षा की जाती थी: शिक्षण-वृत्ति। मोड़ एक मुलाक़ात से आया। एक मित्र के पिता, जो स्वयं पर्वतारोही थे, ने उसे सुझाव दिया कि वह उत्तराखंड के उतरकाशी में नेहरू पर्वतारोहण संस्थान का एक पाठ्यक्रम आज़माए। यह 1990 की बात है। गढ़वाल हिमाचल की ऊँचाई पर बसे उसी संस्थान में मैदानी लड़की ने पहली बार बर्फ़ देखी, और अपने ही आश्चर्य के साथ यह भी पाया कि पहाड़ों के लिए उसमें सहज क्षमता है: अपार सहनशक्ति, ऊँचाई झेलने की ताक़त, और एक शांत स्वभाव जिसे प्रशिक्षकों ने तुरंत भाँप लिया।
नेहरू पर्वतारोहण संस्थान: नवसिखुए से प्रशिक्षक तक
संस्थान में संतोष ने पहले बेसिक पाठ्यक्रम उत्तीर्ण किया, फिर एडवांस्ड, और उसके बाद तैयारी एवं अभियान पाठ्यक्रम। यही वह मानक सीढ़ी है जो एक नवसिखुए को किसी असली चोटी पर ले जाकर चलने लायक बनाती है। उनकी प्रगति इतनी तेज़ थी कि संस्थान ने, और बाद में पूरे भारतीय पर्वतारोहण प्रतिष्ठान ने, उन्हें विद्यार्थी के स्थान पर एक गंभीर आरोही मानना शुरू कर दिया। 1980 के दशक के उत्तरार्ध और 1990 के दशक की शुरुआत में भारतीय हिमाचल की प्रशिक्षण-भूमि की संस्कृति महिलाओं के लिए धीमे-धीमे खुल रही थी। बचेंद्री पाल 1984 में एवरेस्ट पर चढ़ने वाली पहली भारतीय महिला बन चुकी थीं, और उनके बाद उसी संस्थान-व्यवस्था से गुज़रने वाली महिलाओं ने, जिनमें संतोष भी थीं, भारतीय महिलाओं को सर्वोच्च शिखरों पर स्थायी बना दिया। संतोष का एवरेस्ट तक का रास्ता इसी पाठ्यक्रम-पाइपलाइन और छोटे हिमाचल अभियानों पर सहायक-भूमिकाओं से होकर गया; उसके बाद उन्हें उपलब्ध सबसे बड़ी चुनौती के लिए चुना गया।
1992: एवरेस्ट, बचाव-कार्य और एक राष्ट्र का ध्यान
मई 1992 में, 24 वर्ष की आयु में, जिनके बारे में पर्वतारोहण के दायरे से बाहर लगभग कोई नहीं जानता था, संतोष ने भारतीय एवरेस्ट अभियान ("एवरेस्ट-जय" दल) की सदस्य के रूप में माउंट एवरेस्ट (8,849 मीटर) पर चढ़ाई की और यह करने वाली सबसे युवा भारतीय महिलाओं में से एक बनीं। चढ़ाई सुर्ख़ियों में गई। घर-घर का नाम बनाने वाला काम उस पहाड़ पर उतरते समय हुआ। उतराई और थकाऊ ऊँचाई-काम के दौरान एक ढहते, ऑक्सीजन-हीन सह-आरोही को बचाने में स्वयं की सुरक्षा जोखिम में डालने का श्रेय उन्हें दिया जाता है; "मृत्यु क्षेत्र" की निर्दयी परिस्थिति में उन्होंने अपना ऑक्सीजन और शारीरिक सहारा दिया। हर जगह रिपोर्ट हुई इस बात को आज भी उसी क्षण के लिए कहा जाता है जिसके बाद उनका नाम अपनी चढ़ाई से आगे निकल गया। वे भारत मशहूर चेहरा बनकर लौटीं, पर इरादा साफ़ था कि एक एवरेस्ट पर कहानी ख़त्म नहीं होगी।
1993: दूसरी चढ़ाई, जिसने विश्व-रिकॉर्ड बनाया
संतोष ने मई 1993 में पुनः एवरेस्ट पर चढ़ाई की, इस बार ऐतिहासिक भारत-नेपाल महिला एवरेस्ट अभियान की सदस्य के रूप में। नेपाल की ओर से मानक दक्षिणी-गली मार्ग पर उस संयुक्त दल ने शिखर छुआ, जिसमें भारत और नेपाल की महिलाएँ थीं। उस दूसरी चढ़ाई ने उन्हें माउंट एवरेस्ट पर दो बार चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला बना दिया, और उस समय के हिसाब से दो अलग-अलग वर्षों में शिखर छूने वाले पहले व्यक्ति भी। उस ज़माने में, जब व्यावसायिक गाइडिंग ने एवरेस्ट को क़तार नहीं बनाया था, यह पर्वत दो बार चढ़ना, और वह भी लगातार दो आरोहण-मौसमों के अंदर, एक वैश्विक कुलीन कारनामा था। इसने हरियाणा के एक मैदानी कस्बे की उस लड़की को, जिसका पर्वत-जगत से कोई संबंध नहीं था, रिकॉर्ड की किताबों में स्थायी रूप से दर्ज कर दिया। आज भी भारतीय और अंतर्राष्ट्रीय पर्वतारोहण स्रोत उन्हें ऊँची ऊँचाई पर चढ़ने वाली महिलाओं की अग्रदूत बताते हैं।
एवरेस्ट से आगे: कांगशुंग, नेतृत्व और शिक्षण
दोहरी एवरेस्ट-विजय के बाद संतोष शिखर तक सीमित नहीं रहीं; उन्होंने अभियान-नेतृत्व और प्रशिक्षण अपना लिया। 1999 में तिब्बत की ओर एवरेस्ट के दुर्गम और कम आज़माए गए पूर्वी मुख, कांगशुंग, की तरफ़ जाने वाले भारतीय अभियान का उन्होंने नेतृत्व किया; 2001 में पूर्वी मुख की ओर एक और दल का नेतृत्व भी उन्हीं के हाथ में था। वह 1999 का अभियान मिलेनियम इण्डियन एवरेस्ट कांगशुंग फ़ेस अभियान के नाम से दर्ज है, और 'द साउथ एशियन' पत्रिका की जुलाई-अगस्त 2006 की एक समीक्षा उन्हें उस मुख पर सफल भारतीय अभियान का नेतृत्व करने वाली पहली महिला बताती है; उनके प्रचलित जीवनियाँ इसके अलावा उन्हें कांगशुंग मुख से एवरेस्ट पर चढ़ने वाली विश्व की पहली महिला कहती हैं, और यह पृष्ठ उस दावे को दर्ज-के-तौर-पर रखता है, स्वतंत्र रूप से सत्यापित करके नहीं। पुरानी कीर्ति पर बैठे रहने का इरादा लिए बिना उन्होंने तकनीकी और अन्वेषण की नई सीमाओं को निशाना बनाया। वे नेहरू पर्वतारोहण संस्थान में प्रशिक्षक बनीं और वहाँ का चेहरा भी, उसी संस्थान में जहाँ से उन्होंने खुद सीखा था। युवा आरोहियों को उन्होंने मार्गदर्शन दिया। साहसिक गतिविधियों और महिला पर्वतारोहण की कुछ पहलें उन्होंने खुद खड़ी कीं, कुछ को सहारा दिया। शिक्षा और स्वास्थ्य-जागरूकता जैसे सामाजिक मुद्दों के लिए उन्होंने अपना नाम लगाया, और खुले पहाड़ों की ब्रांड व सार्वजनिक अम्बेसडर बनकर देश-विदेश घूमीं। उनकी आत्मकथा और उसके इर्द-गिर्द के सार्वजनिक व्याख्यान छोटे कस्बों की उन भारतीय लड़कियों के लिए नमूना बन गए जिनका पर्वतारोहण से कोई वास्ता नहीं होता।
सम्मान और विरासत
खेल में महिलाओं की अग्रणी भूमिका और उनके आरोहण के लिए भारत सरकार ने संतोष यादव को 2000 में पद्म श्री से नवाज़ा, देश का चौथा सर्वोच्च नागरिक सम्मान। इससे छह वर्ष पूर्व, 1994 में, उन्हें राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार मिला, साहसिक क्षेत्र की उपलब्धि के लिए राज्य की मान्यता; अंग्रेज़ी विकिपीडिया की उनकी जीवनी दोनों सम्मान एक-दूसरे के पास दर्ज करती है, और फ़ेमिना उस साहसिक पुरस्कार को भारत का सर्वोच्च साहसिक-खेल सम्मान बताती है। उन्हें राष्ट्रीय साहसिक मान्यता, खेल-सम्मान और नागरिक प्रशस्तिपत्र मिले, और एवरेस्ट पर दो बार चढ़ने वाले पहले आरोहकों में गिनती। पर इसका सबसे बड़ा असर सांस्कृतिक रहा, और वह इस बात से जुड़ा है कि कोशिश करने का हक़ किसे माना जाता है। एक ऐसे देश में, जहाँ मैदानी, समुद्र से कटे और बर्फ़-रहित कस्बे की लड़की से यही अपेक्षा रखी जाती थी कि पहले विवाह और फिर शिक्षिका की नौकरी, संतोष ने दिखा दिया कि धरती की सबसे ऊँची चोटियाँ सबसे साधारण शुरुआत से भी पहुँच में आ सकती हैं। उन्हें इस अभिलेखागार में जान-बूझकर उन यादवों के साथ रखा गया है जिन्होंने समुदाय के नाम को वैश्विक उपलब्धि तक पहुँचाया। सूर्यकुमार यादव और कुलदीप यादव विश्व क्रिकेट में हैं, वे पर्वतारोहण में; यह दर्ज करने के लिए कि "यादव" खेल और अन्वेषण के शिखर पर भी उतनी सहजता से मिलता है जितना राजनीति में। उनकी यह प्रोफ़ाइल हस्तियों के अभिलेखागार में रखी गई है।
भारतीय पर्वतारोहण में उनके रिकॉर्ड का अर्थ
यह समझना ज़रूरी है कि संतोष यादव के दो शिखर-आरोहण आज भी कितना महत्व रखते हैं, और इसके लिए उन्हें उनके ज़माने में रखना होगा। 1990 के दशक की शुरुआत में एवरेस्ट वह व्यावसायिक, गाइड-सहित चढ़ाई नहीं बन चुका था जो बाद में बना। उस जमाने में किसी भारतीय अभियान का हिस्सा बनने का मतलब था संस्थान में कई वर्षों तक प्रशिक्षण, प्रतिस्पर्धी चयन, फ़िटनेस परीक्षण और छोटे हिमालयी शिखरों का पहले से जमा अनुभव। उस व्यवस्था से गुज़रने वाली महिलाओं ने (1984 में बचेंद्री पाल, पहली भारतीय महिला के रूप में; फिर 1992-93 की वह पीढ़ी जिसमें संतोष थीं) अपने कंधों पर पूरे भारतीय पर्वतारोहण की साख रखी थी, और उनके नतीजों ने तय किया कि उनके पीछे खुले दरवाज़े खुले रहेंगे या बंद होंगे। उस परिस्थिति में संतोष का जवाब असामान्य रूप से पूरा था। उन्होंने शिखर छुआ। उन्होंने संकट के समय एक साथी का प्राण बचाकर ख़ुद को सिद्ध किया। अगले वर्ष उन्होंने एक संयुक्त अंतर्राष्ट्रीय अभियान पर फिर चोटी ली। उसके बाद का दशक उन्होंने उसी संस्थान-व्यवस्था की शिक्षण और नेतृत्व वाली भूमिकाओं में बिताया जिसने उन्हें बनाया था। किसी भी देश के, किसी भी दशक के, बहुत कम आरोही उस सीढ़ी के इतने पायदान इतनी जल्दी और इतनी चर्चा के साथ चढ़े हैं; यही कारण है कि भारतीय महिला पर्वतारोहण का इतिहास लिखते समय उनका नाम हर बार आता है।
यह प्रोफ़ाइल कैसे सत्यापित की गई
जन्म की तिथि और स्थान, एवरेस्ट चढ़ाइयों का क्रम व वर्ष (1992 और 1993), भारत-नेपाल महिला एवरेस्ट अभियान, 1999 का कांगशुंग मुख और 2001 का पूर्वी मुख नेतृत्व, राष्ट्रीय साहसिक पुरस्कार का वर्ष, पद्म श्री का वर्ष और नेहरू संस्थान में उनका प्रशिक्षण, इनका मिलान 5 अक्टूबर 2026 को अंग्रेज़ी विकिपीडिया की उनकी जीवनी, टाइम्स ऑफ इंडिया की 2016 की प्रोफ़ाइल, फ़ेमिना के पुरस्कार-विवरण, दूरदर्शन और प्रसार भारती के अभिलेखागार-साक्षात्कारों तथा 'द साउथ एशियन' की 1999 अभियान पर समीक्षा से किया गया। जहाँ लोकप्रिय पुनर्कथन बारीक़ी में अलग हो जाते हैं, वहाँ यह प्रोफ़ाइल उतना ही कहती है जतना स्रोतों में लगातार लिखा मिलता है, और बहस वाले एकल विवरण को तय नहीं बताती: दूसरी चढ़ाई की तारीख़ हमारे पास अभिलेखीय और सामाजिक सारांशों में 4 मई 1993 तथा 10 मई 1993 दोनों रूपों में आती है, अतः यह पृष्ठ केवल माह देता है, दिन नहीं; और 1992 में जिन आरोही की उन्होंने सहायता करने का श्रेय पाया, उनका नाम किसी भी पढ़े गए स्रोत में तय नहीं है। हमारा निरंतर तृतीय-पक्ष क्रॉस-चेक अंग्रेज़ी विकिपीडिया का संतोष यादव (पर्वतारोही) लेख है; काम चलाने वाले तथ्य मौलिक रिपोर्टिंग से लिए गए हैं। कहीं ग़लती दिखे तो सुधार नीति बताती है कि सबूत के साथ उसे कैसे ठीक कराया जाए।