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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी 12 अगस्त 2014 को बलयोगी सभागार, संसद पुस्तकालय भवन, नई दिल्ली में शरद यादव को वर्ष 2012 का उत्कृष्ट सांसद पुरस्कार प्रदान करते हुए; चित्र में उपराष्ट्रपति मोहम्मद हमीद अंसारी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी हैं; फ़ोटोग्राफ़ राष्ट्रपति सचिवालय, विकिमीडिया कॉमन्स, सरकार ओपन डेटा लाइसेंस - भारत
फोटो: Wikimedia Commons
राजनेता तथ्य-सत्यापित

शरद यादव

राजनेता; सांसद

शरद यादव (1 जुलाई 1947 – 12 जनवरी 2023) भारतीय समाजवादी राजनेता थे, जिन्होंने लोकसभा में सात और राज्यसभा में चार बार काम किया। उन्होंने 1974 में जेल में बैठकर जबलपुर का उपचुनाव 27 वर्ष की आयु में जीता, चार केंद्रीय मंत्रालय संभाले, वी. पी. सिंह सरकार पर मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने का दबाव बनाया, और 2003 से 2016 तक जनता दल (संयुक्त) के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे।

  • जन्म 1 जुलाई 1947
  • बाबई गाँव, होशंगाबाद ज़िला, मध्य प्रदेश, भारत

किस लिए प्रसिद्ध: सात बार के सांसद जिन्होंने 1974 में जेल से बैठकर जबलपुर का उपचुनाव जीता, 1990 में वी. पी. सिंह सरकार पर मंडल आयोग लागू करने का दबाव बनाया, चार केंद्रीय मंत्रालय संभाले और जनता दल (संयुक्त) खड़ा किया

जीवनी और करियर का अवलोकन

शरद यादव (1 जुलाई 1947 – 12 जनवरी 2023) ने भारतीय संसदीय राजनीति में पाँच दशक बिताए और यह तीन अलग-अलग राज्यों से किया। अंग्रेज़ी विकिपीडिया के लेख के अनुसार उनके पास लोकसभा की सात और राज्यसभा की चार अवधियाँ हैं, चार केंद्रीय मंत्रालय, 2003 में जनता दल (संयुक्त) के बनने से 2016 तक उसका राष्ट्रीय अध्यक्ष पद, और 2017 में राज्यसभा से अयोग्यता, जिसने 1974 से शुरू हुआ उनका संसदीय काल समाप्त कर दिया। उन्होंने पहली बार 27 वर्ष की आयु में, एक उपचुनाव में, और जेल में बैठकर जीत हासिल की। मधेपुरा में वे चार बार चुने गए और ठीक उतनी ही बार हारे, और हर बार फिर खड़े हुए।

उनका निर्वाचन रिकॉर्ड सबसे असामान्य हिस्सा है। वे मध्य प्रदेश की जबलपुर सीट से दो बार, उत्तर प्रदेश की बदायूँ सीट से एक बार और बिहार की मधेपुरा सीट से चार बार सांसद चुने गए, और लेख खुद इस तीन-राज्य फैलाव को दुर्लभ बताता है। दलीय रिकॉर्ड उतना साफ़ नहीं है: भारतीय लोक दल, जनता पार्टी, लोक दल, जनता दल, जनता दल (संयुक्त), लोकतांत्रिक जनता दल, और अंत में 2019 का चुनाव राष्ट्रीय जनता दल की टिकट पर लड़ना। लगातार धागा जयप्रकाश नारायण और राम मनोहर लोहिया की समाजवादी राजनीति का है, जो उन्हें 1970 में जबलपुर के छात्र के रूप में मिली और जिसे उन्होंने कभी छोड़ा नहीं; बदले केवल उसी विचार को ढोने वाली पार्टियाँ बदलीं।

यह अभिलेखागार उन्हें इसलिए रखता है क्योंकि भारतीय सार्वजनिक जीवन में यादव उपनाम उनके करियर में दो बार काम आता है। लेख दर्ज करता है कि उन्होंने वी. पी. सिंह सरकार पर मंडल आयोग की सिफ़ारिशें लागू करने का दबाव बनाया, और 1999 की मधेपुरा टक्कर इस बात को लेकर देखी गई थी कि यादव समुदाय का वोट किस ओर जाता है।

बाबई, और जबलपुर का इंजीनियरिंग कॉलेज

यादव का जन्म 1 जुलाई 1947 को मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के बाबई गाँव में नंद किशोर यादव और सुमित्रा यादव के घर हुआ। उन्होंने जबलपुर के रॉबर्टसन कॉलेज, जिसे बाद में सरकारी विज्ञान महाविद्यालय का नाम मिला, से स्नातक की डिग्री ली और फिर जबलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से विद्युत इंजीनियरी में बी.ई. की डिग्री ली, जहाँ वे स्वर्ण पदक विजेता रहे।

कॉलेज के वर्षों ने ही उनकी राजनीति बनाई। वे 1970 में जबलपुर विश्वविद्यालय के छात्र संघ के अध्यक्ष बने और बिहार के छात्र आंदोलन में शामिल हो गए; लेख के अनुसार जयप्रकाश नारायण तथा राम मनोहर लोहिया की समाजवादी विचारधारा का उन पर भारी प्रभाव पड़ा। यादव को 1972 में और फिर 1975 में छात्र आंदोलन में काम करने के लिए जबलपुर पुलिस ने जेल डाला।

1974: जेल से लड़ा गया उपचुनाव

जबलपुर की लोकसभा सीट 1974 में उस समय के बैठे हुए सदस्य सेठ गोविंद दास की मृत्यु से खाली हुई। यादव ने खाली हुई इस सीट पर भारतीय लोक दल के टिकट से उपचुनाव लड़ा, तब जब जेपी आंदोलन अपने चरम पर था। वे 27 वर्ष के थे, जेल में थे, और जीत गए।

उन्होंने 1977 के आम चुनाव में यही सीट नए बने जनता पार्टी के झंडे पर फिर जीती। वह दल 1979 में टूटा और यादव चरण सिंह के पक्ष में गए। वे 1978 में युवा लोक दल के अध्यक्ष भी बने।

अमेठी, बदायूँ, और राज्यसभा के चार वर्ष

1980 का दशक उनके रिकॉर्ड का सबसे ख़राब हिस्सा है। जब राजीव गांधी 1981 में अमेठी के उपचुनाव से लोकसभा में आए, तो यादव लोक दल की ओर से हारे हुए उम्मीदवार थे। 1984 के आम चुनाव में वे उत्तर प्रदेश की बदायूँ सीट से लड़े और कांग्रेस के सलीम इक़बाल शेरवानी से हार गए।

उन्होंने 1986 में राज्यसभा का रुख़ किया और 5 जुलाई 1986 से 28 नवंबर 1989 तक वहाँ रहे। उसी दौर में वे 1989 से 1997 तक जनता दल के महासचिव और संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष रहे, पद जो लेख 1989 से 1997 तक दर्ज करता है।

वे 1989 के चुनाव में जनता दल के उम्मीदवार के रूप में बदायूँ से वापस लोकसभा आए, जहाँ कांग्रेस के राम नरेश यादव उनके पीछे रहे। वह चुनाव बफ़ोर्स घोटाले की चर्चा में हुआ। कांग्रेस सबसे बड़ी एकल पार्टी होते हुए भी सरकार नहीं बना सकी, और यादव उस वामपंथी विपक्षी गठबंधन के बड़े खिलाड़ियों में से थे जिसने वी. पी. सिंह को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया और जिसे भारतीय जनता पार्टी का बाहरी समर्थन हासिल था। यादव को पहला कैबिनेट पद मिला: कपड़ा और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग मंत्री।

मंडल, 1990

भारतीय सामाजिक इतिहास में उनकी जगह तय करने वाला निर्णय कैबिनेट ने लिया था, और उनका काम उस पर ज़ोर डालना था। मंडल आयोग की सिफ़ारिश पिछड़े वर्गों के आरक्षण की थी। लेख यादव को उस कैबिनेट के सबसे प्रभावशाली सदस्यों में से एक बताता है; उन्होंने वी. पी. सिंह पर सिफ़ारिशें लागू करने का दबाव बनाया। सरकार ने 1990 में लागू कीं।

लेख के अनुसार लागू करने के बाद बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और जाति की राजनीति आगे आ गई। इसे लेकर यह कहा जा सकता है कि वे इस फ़ैसले के वास्तुकार थे या कैबिनेट के अंदर दबाव डालने वालों में से एक; दर्ज यह है कि यह माँग कैबिनेट तक ले जाने वाले मंत्री बदायूँ के शरद यादव थे, और जिस सरकार ने यह फ़ैसला लिया, वह अगले वर्ष ही चली गई।

मधेपुरा, और लालू प्रसाद यादव से तीन टक्करें

यादव ने 1991 के चुनाव में अपना अड्डा बिहार की मधेपुरा सीट पर बनाया और जीते; झारखंड पार्टी के आनंद मोहन दूसरे स्थान पर रहे। उन्होंने 1996 में यही सीट समता पार्टी के आनंद मंडल को हराकर बरकरार रखी और उस संसद में वित्त समिति के अध्यक्ष बने। 1997 से 1999 तक वे जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे।

1998 में, आई. के. गुजराल सरकार के गिरने के बाद, उन्होंने मधेपुरा लालू प्रसाद यादव के हाथों गँवाया, जो जनता दल से अलग होकर राष्ट्रीय जनता दल बनाने वाले थे। दोनों 1999 में फिर मिले और इस बार यादव जीते। लेख दर्ज करता है कि चारा घोटाले में लालू प्रसाद के फँसने से उनकी लोकप्रियता घटी थी, और यह मुकाबला बेसब्री से देखा गया कि यादव समुदाय का वोट किस तरफ जाता है।

तीसरी बार दोनों 2004 में आमने-सामने आए। लालू प्रसाद ने दो सीटें, मधेपुरा और चपरा, लीं और दोनों जीत लीं, फिर मधेपुरा छोड़ दी; इस सीट के लिए हुए उपचुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के पप्पू यादव जीते। उस समय यादव वाजपेयी सरकार में केंद्रीय मंत्री थे, और उनकी अपनी सीट जा चुकी थी।

वे 2009 में मधेपुरा से लोकसभा में लौटे, जहाँ राष्ट्रीय जनता दल के रविंद्र चरण यादव के ख़िलाफ़ उनका मार्जिन लगभग 1,75,000 वोट था, और अगस्त 2009 से 2010 तक शहरी विकास समिति के अध्यक्ष रहे। उन्हें यही सीट 2014 में पप्पू यादव के हाथों और 2019 में जनता दल (संयुक्त) के दिनेश यादव के हाथों फिर गँवानी पड़ी; 2019 का चुनाव उन्होंने राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर लड़ा था। एक ही निर्वाचन-क्षेत्र में अट्ठाईस वर्षों में चार जीत और चार हार उनके रिकॉर्ड का सबसे साफ़ आँकड़ा है।

जनता दल (संयुक्त) का निर्माण

1999 के बाद जनता दल इस बात पर टूटा कि केंद्र में किसका साथ दिया जाए। जे. एच. पटेल के नेतृत्व वाले धड़े ने राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन का समर्थन किया; एच. डी. देवगौड़ा कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों से बराबर दूरी चाहते थे और अपने समर्थकों के साथ जनता दल (सेक्युलर) बना लिया। यादव से जुड़े हुए बचे हुए धड़े ने लोक शक्ति और समता पार्टी के साथ मिलकर 2003 में जनता दल (संयुक्त) के रूप में पंजीकरण कराया, और यादव उसके पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। उन्होंने यह पद 2016 तक, तेरह वर्ष तक रखा, जो उनके करियर का सबसे लंबा पद रहा।

इस पार्टी का अड्डा बिहार रहा, और लेख वहाँ की पार्टी नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली बताता है; यादव उसी दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। 2018 में उन्होंने बिहार में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन के विरोध में उस दल से दूरी बना ली।

चार मंत्रालय, और पैदल चलने वालों वाली एक बात

यादव ने वी. पी. सिंह और अटल बिहारी वाजपेयी की सरकारों में चार केंद्रीय मंत्रालय संभाले। पहले कपड़ा और खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, दिसंबर 1989 से नवंबर 1990 तक। फिर 13 अक्तूबर 1999 से सितंबर 2001 के फ़ेरबदल तक नागरिक उड्डयन। श्रम और रोज़गार सितंबर 2001 से जून 2002 तक रहा, और उपभोक्ता मामले, खाद्य तथा सार्वजनिक वितरण 1 जुलाई 2002 से 15 मई 2004 तक, जब सरकार चली गई।

उड्डयन मंत्री के रूप में उनके काम की आलोचना इस क्षेत्र में सुधार न होने की वजह से हुई, और उसी दौर की वह पंक्ति आज भी उनसे जोड़कर उद्धृत की जाती है। उनका बचाव, लेख में दर्ज है, यह था कि चलने के सिवाय कोई दूसरा साधन न रखने वालों के देश में उड़ान की चिंता एक वर्ग की चिंता है: "इस देश जहाँ करोड़ों लोगों के पास चलने के सिवाय कोई दूसरा परिवहन नहीं, उड़ान की चिंता बहुत अभिजात वर्गीय"।

राज्यसभा, 2जी की जाँच समिति, और 2017 की अयोग्यता

वे 8 जुलाई 2004 को फिर राज्यसभा आए और 16 मई 2009 तक रहे; जून 2006 से नैतिकता समिति के सदस्य भी बने रहे। 2009 के चुनाव के बाद वे फिर लोकसभा गए, और मार्च 2011 से अक्तूबर 2013 तक दूरसंचार लाइसेंस और स्पेक्ट्रम आवंटन की जाँच करने वाली संयुक्त संसदीय समिति में बैठे। लेख में इस समिति की सदस्यता के आगे उसकी रिपोर्ट का कोई ब्योरा नहीं है, इसलिए यहाँ भी उतना ही दर्ज है; बाद में यह जाँच 2जी घोटाले के नाम से जानी गई।

यादव जून 2014 और फिर जुलाई 2016 में राज्यसभा निर्वाचित हुए, और जुलाई 2016 से सितंबर 2017 तक उद्योग समिति के अध्यक्ष रहे। 2017 में दल के नेतृत्व ने उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई करते हुए उन्हें दल-विरोधी गतिविधियों के आधार पर राज्यसभा से अयोग्य ठहरा दिया और पदों से हटा दिया। उसी वर्ष उन्होंने एक भाषण दिया जिसमें वोट की तुलना बेटी की इज़्ज़त से की और कहा कि पहले वाली चीज़ बचाने लायक है; लेख में यह बात इतनी ही दर्ज है। उनकी चौथी राज्यसभा अवधि 4 दिसंबर 2017 को समाप्त हुई।

वे हवाला मामले के भी आरोपितों में थे, जो ग़ैर-क़ानूनी नकदी लेन-देन की जाँच थी और जिसमें कई दलों के राजनेताओं के नाम आए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन पर लगे आरोप ख़ारिज कर दिए।

लोकतांत्रिक जनता दल, और आख़िरी चुनाव

यादव ने 2018 में बिहार में भारतीय जनता पार्टी के साथ गठबंधन के विरोध में जनता दल (संयुक्त) छोड़ दिया और मई 2018 में लोकतांत्रिक जनता दल बनाया। दिसंबर 2012 में बनी बहुजन मुक्ति पार्टी के साथ प्रस्तावित विलय की चर्चा हुई और फिर रद्द कर दी गई। 2019 के आम चुनाव में वे मधेपुरा से फिर खड़े हुए, इस बार राष्ट्रीय जनता दल के टिकट पर, और जनता दल (संयुक्त) के दिनेश यादव से हार गए।

परिवार

उन्होंने 15 फ़रवरी 1989 में रेखा से विवाह किया। उनके एक पुत्र और एक पुत्री हैं। उनके पुत्र शंतनु बुंदेला का नाम लेख में लंदन विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर करने वाला दर्ज है, और उसके आगे लेख में उनके बारे में कुछ नहीं दर्ज। उनकी पुत्री सुभाषिनी राजा राव 2020 के बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में शामिल हुईं और घोषणा की कि वे बिहारगंज सीट से लड़ेंगी; उन्होंने उस सीट पर राष्ट्रीय जनता दल की उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा और हार गईं। बीच में दल बदलना ही रिकॉर्ड में है, और इससे आगे कुछ नहीं लिखा जा रहा।

मृत्यु

शरद यादव की 12 जनवरी 2023 को गुड़गाँव में 75 वर्ष की आयु में मृत्यु हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शोक व्यक्त किया और आम लोगों के कल्याण के लिए उनके काम का ज़िक्र किया। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भी शोक जताया और राज्य में एक दिन के शोक की घोषणा की। 14 जनवरी को उन्हें पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ अंतिम विदाई दी गई; उनका अंतिम संस्कार होशंगाबाद ज़िले के अपने पैतृक गाँव अंखमऊ में हुआ, उसी ज़िले में जहाँ उनका जन्म हुआ था।

यह पृष्ठ किस शरद यादव के बारे में है

यह नाम उत्तर भारतीय राजनीति में आम है, और इसकी खोज में कई पदधारी और ग़ैर-पदधारी मिलते हैं। यह प्रोफ़ाइल होशंगाबाद और मधेपुरा के उस जनता दल और जनता दल (संयुक्त) सांसद के बारे में है जो 2023 में गुज़र गए। यह शरद पवार के बारे में नहीं है, जो महाराष्ट्र के राजनेता हैं। दोनों के बीच समानता केवल नाम की है; गाँव अलग, दल-इतिहास अलग और उपनाम भी अलग।

यह प्रोफ़ाइल कैसे सत्यापित की गई

तारीख़ें, पद, निर्वाचन-क्षेत्र के परिणाम, वोट-मार्जिन, मंत्रालयों की अवधि, समिति-सदस्यता, उड़ान पर उद्धृत वाक्य, परिवार का विवरण और मृत्यु का ब्योरा अंग्रेज़ी विकिपीडिया के शरद यादव लेख से लिए गए हैं, और इन्हें उसी लेख की पद-तालिका तथा इस पृष्ठ पर लगे फ़ोटोग्राफ़ के विकिमीडिया कॉमन्स फ़ाइल-पृष्ठ से मिलाया गया है। जहाँ उस लेख में नागरिक उड्डयन मंत्रालय के समाप्ति-दिवस को लेकर दो तारीख़ें मिलती हैं, वहाँ मंत्रालय के अपने फ़ेरबदल की तारीख़ दी गई है और अंतर को मिटाया नहीं गया है। 2017 में दल-विरोधी गतिविधि के आधार पर राज्यसभा से अयोग्यता और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा हवाला-आरोप ख़ारिज होने की बात लेख में ज्यों की त्यों दर्ज है और न्यायालय के फ़ैसले का नाम दिया गया है। बिहार की चुनावी जुबान में उनसे जोड़े जाने वाले नारे पर कोई परामर्श किया हुआ स्रोत नहीं मिला, इसलिए वह यहाँ छपा नहीं है। त्रुटि होने पर इस साइट की सुधार-नीति के तहत सुधार दर्ज कराया जा सकता है।

उपलब्धियां

  • तीन राज्यों की सीटों से सात बार लोकसभा सदस्य: बिहार की मधेपुरा चार बार, मध्य प्रदेश की जबलपुर दो बार, उत्तर प्रदेश की बदायूँ एक बार
  • 1974 में सेठ गोविंद दास की मृत्यु से खाली हुई जबलपुर सीट का उपचुनाव 27 वर्ष की आयु में हिरासत में बैठकर जीता
  • जनता दल (संयुक्त) के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष, 2003 में पंजीकरण से 2016 तक
  • केंद्रीय मंत्री: कपड़ा तथा खाद्य प्रसंस्करण उद्योग, नागरिक उड्डयन, श्रम और रोज़गार, तथा उपभोक्ता मामले, खाद्य और सार्वजनिक वितरण
  • दूरसंचार लाइसेंस और स्पेक्ट्रम आवंटन पर संयुक्त संसदीय समिति के सदस्य, मार्च 2011 से अक्तूबर 2013
  • 1997 से 1999 तक जनता दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष और 1970 में जबलपुर विश्वविद्यालय छात्र संघ के अध्यक्ष

सत्यापित स्रोत एवं संदर्भ

संपादकीय स्वतंत्रता. संपादकीय टीम का जनता दल (संयुक्त), राष्ट्रीय जनता दल, लोकतांत्रिक जनता दल या इस प्रोफ़ाइल में नाम लिए किसी दल से कोई संबंध नहीं है। संपादकीय नीति

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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

शरद यादव कौन थे?

शरद यादव (1 जुलाई 1947 – 12 जनवरी 2023) भारतीय समाजवादी राजनेता थे, जिन्होंने लोकसभा में सात और राज्यसभा में चार अवधियाँ बिताईं। उनका जन्म मध्य प्रदेश के होशंगाबाद ज़िले के बाबई गाँव में हुआ, वे 1974 में जबलपुर से संसद गए और बाद में बिहार की मधेपुरा सीट से सांसद रहे। वे जनता दल (संयुक्त) के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और चार केंद्रीय मंत्रालय संभालने वाले मंत्री रहे।

शरद यादव कितनी बार सांसद बने?

लोकसभा के लिए सात बार और राज्यसभा के लिए चार बार। लोकसभा की सातों सीटें तीन राज्यों से आईं: मधेपुरा से चार बार, जबलपुर से दो बार और बदायूँ से एक बार। यह तीन-राज्य फैलाव लेख में दुर्लभ बताया गया है।

मंडल आयोग के फ़ैसले में शरद यादव की क्या भूमिका थी?

वे 1989 और 1990 में वी. पी. सिंह की सरकार के वरिष्ठ कैबिनेट मंत्री थे और उन्होंने प्रधानमंत्री पर पिछड़ों के आरक्षण की मंडल आयोग सिफ़ारिशें लागू करने का दबाव बनाया। सरकार ने 1990 में लागू किया, जिसके बाद लेख के अनुसार बड़े पैमाने पर प्रदर्शन हुए और जाति की राजनीति सामने आ गई।

क्या शरद यादव जेल से चुनाव जीते थे?

हाँ। उन्होंने 1974 का जबलपुर उपचुनाव भारतीय लोक दल के टिकट पर हिरासत में बैठकर लड़ा और 27 वर्ष की आयु में जीते। वह दौर छात्र आंदोलन में गिरफ़्तारियों के बाद का था। उन्होंने 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर यही सीट दोबारा जीती।

शरद यादव को राज्यसभा से अयोग्य क्यों ठहराया गया?

अंग्रेज़ी विकिपीडिया के लेख के अनुसार उन्हें 2017 में दल-विरोधी गतिविधियों के आधार पर राज्यसभा से अयोग्य ठहराया गया और दल के नेतृत्व पदों से हटा दिया गया। उनकी चौथी अवधि 4 दिसंबर 2017 को समाप्त हुई। जनता दल (संयुक्त) के राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से उन्हें इससे पहले 2016 में हटाया जा चुका था।

लालू प्रसाद यादव से शरद यादव का क्या संबंध रहा?

दोनों ने एक ही लोकसभा सीट, मधेपुरा, के लिए तीन बार आमने-सामने चुनाव लड़ा। लालू प्रसाद यादव ने 1998 में और दो सीटें लड़कर 2004 में यह सीट जीती; शरद यादव ने 1999 में यह वापस ली। लेख के अनुसार 1999 का मुकाबला इसी सवाल को लेकर देखा गया कि बिहार के यादव समुदाय का वोट किस तरफ जाता है।

क्या शरद यादव पर कोई आपराधिक मामला था?

वे हवाला मामले के आरोपितों में थे, जो ग़ैर-क़ानूनी नकदी लेन-देन की जाँच थी और जिसमें कई दलों के राजनेताओं के नाम आए। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने उन पर लगे आरोप ख़ारिज कर दिए। 2017 में राज्यसभा से अयोग्यता संसदीय अनुशासन की बात है और आपराधिक कार्रवाई से अलग है।

शरद यादव की मृत्यु कब हुई?

उनकी मृत्यु 12 जनवरी 2023 को गुड़गाँव में 75 वर्ष की आयु में हुई। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने शोक जताकर राज्य में एक दिन के शोक की घोषणा की, और 14 जनवरी को होशंगाबाद ज़िले के उनके पैतृक गाँव अंखमऊ में पूर्ण राजकीय सम्मान के साथ अंतिम संस्कार हुआ।

क्या यह पृष्ठ शरद पवार के बारे में है?

नहीं। शरद पवार महाराष्ट्र के राजनेता हैं। यह पृष्ठ मध्य प्रदेश और बिहार के शरद यादव के बारे में है जो 2023 में गुज़र गए। दोनों में समानता केवल नाम की है, बाक़ी सब अलग।

त्वरित तथ्य (Quick Facts)

सत्यापित
जन्म तिथि
1 जुलाई 1947
उम्र
79 वर्ष 2 अक्टूबर 2026 तक
जन्म स्थान
बाबई गाँव, होशंगाबाद ज़िला, मध्य प्रदेश, भारत
व्यवसाय
राजनेता; सांसद
वर्तमान पद
सांसद, मधेपुरा (लोकसभा, चार अवधियाँ); राज्यसभा सदस्य (चार अवधियाँ); जनता दल (संयुक्त) के पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष, 2003-2016
अंतिम सत्यापन: 2026-10-02