जीवनी और करियर का अवलोकन
योगेंद्र यादव, जिनका जन्म-नाम सलीम यादव था और जो 5 सितंबर 1963 को जन्मे, भारतीय सार्वजनिक बौद्धिक जीवन का दुर्लभ उदाहरण हैं जहाँ दो यात्राएँ लगभग समान गंभीरता से साथ-साथ चलती रही हैं। एक ओर देश के सबसे प्रभावशाली चुनाव-विश्लेषक (जिन्होंने राज्यों में मतदाता क्यों और कैसे वोट करते हैं, यह वैज्ञानिक भाषा में बदला) दूसरी ओर 2011 के भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन से उठे राजनीतिक कार्यकर्ता, जो आम आदमी पार्टी की सह-स्थापना और मुख्य रणनीतिकार की भूमिका से आगे बढ़े, 2015 में पार्टी से नाटकीय निष्कासन झेला, स्वराज इंडिया की स्थापना की और आज भारत जोड़ो अभियान के राष्ट्रीय संयोजक हैं। 2024 के सामान्य चुनाव में उनके पूर्वानुमान देश में सबसे अधिक उद्धृत स्वतंत्र चुनाव-चर्चा का विषय रहे। उनका बिहार-उत्तर प्रदेश के यादव राजनीतिक खानदानों से कोई पारिवारिक संबंध नहीं है (उनके पिता हरियाणा (तत्कालीन पंजाब राज्य) के रेवाड़ी जिले के एक गाँव में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे) लेकिन उनका पूरा शोध-कार्य उसी यादव समुदाय सहित पिछड़े वर्गों के राजनीतिक उठाव को बूथ-स्तर पर मापने में बीता है। यह प्रोफाइल उनके प्रकाशित शैक्षिक रिकॉर्ड, तिथि-सहित मीडिया रिपोर्टिंग और सतत-अद्यतन Wikipedia लेख से सुमेलित कर बनाई गई है।
प्रारंभिक जीवन: पाँच वर्ष में बदला गया नाम
योगेंद्र यादव का जन्म साहरणवास गाँव (तत्कालीन पंजाब राज्य, आज हरियाणा के रेवाड़ी जिले में) एक शिक्षक-परिवार में हुआ। उनके दादा स्कूल के शिक्षक थे, जिन्हें 1936 के एक साम्प्रदायिक दंगे में मार दिया गया, जब उनके पिता देवेन्द्र सिंह यादव केवल सात वर्ष के थे; देवेन्द्र सिंह आगे चलकर कॉलेज में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर बने। योगेंद्र का जन्म-नाम सलीम था, परिवार के अनुसार उसी 1936 की घटना का प्रतिकार-स्वरूप रखा गया नाम, जो रिश्तेदारों और घनिष्ठ मित्रों में घर में प्रयुक्त होता रहा। पाँच वर्ष की आयु में स्कूल में उपहास उड़ने पर परिवार ने नाम बदलकर योगेंद्र रख दिया। उनकी शिक्षा में राजस्थान विश्वविद्यालय से बी.ए., जेएनयू से राजनीति विज्ञान में एम.ए. और पंजाब विश्वविद्यालय से एमफिल शामिल हैं। उनकी पत्नी मधुलिका बैनर्जी दिल्ली विश्वविद्यालय की प्राध्यापक हैं। वे स्वयं समाजवादी चिन्तक किशन पटनायक से प्रभाव स्वीकार करते हैं।
भारत में चुनावों के वैज्ञानिक अध्ययन की नींव
राजनेता बनने से बहुत पहले, योगेंद्र यादव भारत में 'पसेफोलॉजिस्ट' शब्द को लोकप्रिय बनाने वाले व्यक्ति थे। 1985–1993 तक उन्होंने पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ में राजनीति विज्ञान के सहायक प्राध्यापक के रूप में पढ़ाया। 1995–2002 में वे लोकनीति नेटवर्क के संस्थापक-संयोजक रहे (राज्यों के चुनावों का अध्ययन करने वाले शोधकर्ताओं का अखिल-भारतीय नेटवर्क) और 1997–2003 में सीएसडीएस-लोकनीति की तुलनात्मक लोकतंत्र-कार्यक्रम के संस्थापक-निदेशक। संजय कुमार, सुहास पलशीकर जैसे सहयोगियों के साथ उनके पोस्ट-पोल सर्वेक्षण आँकड़ों ने जाति-गणित, कल्याण-राजनीति और पदस्थ-विरोधी मतदान के पैटर्न पर राष्ट्रीय बहस को नई बुनियाद दी। 2004 से 2016 तक वे सीएसडीएस, दिल्ली के सीनियर फेलो रहे। 1996 से दूरदर्शन, एनडीटीवी, सीएनएन-आईबीएन सहित कई चैनलों पर उनका चुनाव-विश्लेषण प्रसारित होता रहा, परिणाम की रात का विवरण व्याख्यान में बदल देने वाला चेहरा। उनके संपादित एवं रचित ग्रंथों में State of Democracy in South Asia (2008), Electoral Politics in Indian States (2009), Democracy in Multi-national Societies (2010, अल्फ्रेड स्टेपन व Juan Linz के साथ), NCERT की Democratic Politics (2006, सुहास पलशीकर के साथ मुख्य सलाहकार) और Making Sense of Indian Democracy (2020) शामिल हैं; सतीश देशपांडे के साथ उनका पेपर 'Redesigning Affirmative Action' उच्च-शिक्षा में आरक्षण के लाभ-वितरण का प्रभावशाली विश्लेषण है। 2010 में भारत सरकार ने उन्हें शिक्षा का अधिकार कानून की राष्ट्रीय सलाहकार परिषद (NAC-RTE) में नियुक्त किया। उनके सम्मानों में माल्कम अडिशेशियाह डेवलपमेंट स्टडीज पुरस्कार (2008) और अंतर्राष्ट्रीय राजनीति विज्ञान संघ का ग्लोबल साउथ सॉलिडैरिटी अवॉर्ड (2009) हैं।
आम आदमी पार्टी के वर्ष: आंदोलन से दरार तक
2011 के अखिल-भारतीय भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन में सार्वजनिक मंचों पर भाषण देने के बाद वे उसी से उठी आम आदमी पार्टी के केंद्रीय चेहरों में रहे और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य बने। जुलाई 2011 में उन्हें University Grants Commission की सदस्यता भी मिली; केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने 'हितों के टकराव' के आधार पर सितंबर 2013 में उन्हें UGC पद से हटने पर मजबूर किया, जिसका उन्होंने सार्वजनिक विरोध किया। दिल्ली की 2013 की चुनावी जीत (70 दिन की सरकार) में उनकी रणनीति-शिल्पिता को व्यापक रूप में श्रेय दिया गया; 2014 का लोकसभा चुनाव उन्होंने गुरुग्राम से लड़ा, चौथे स्थान पर रहे और जमा राशि जब्त हो गई। दरार मार्च 2015 में आई: 4 मार्च को राजनीतिक मामले समिति (PAC) से मतदान से बाहर, 28 मार्च को 'अनुशासन-विरोधी गतिविधि' के आरोप में राष्ट्रीय कार्यकारिणी से निष्कासन, और अप्रैल में पार्टी से ही निष्कासन। उनकी सफाई, जो तब से अडिग है: अरविंद केजरीवाल की 'तानाशाह अंदाज़' की राजनीति को चुनौती देने की सज़ा दी गई। AAP का पक्ष अनुशासन-भंग था। उस दरार ने भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी सार्वजनिक बहसों में से एक को जन्म दिया, और 'Yogendra Yadav AAP' उनके नाम की सबसे अधिक खोजी जाने वाली अभिव्यक्ति बन गई।
स्वराज इंडिया, किसान और विपक्षी पुनर्संरेखण
प्रशांत भूषण, समाजशास्त्री आनंद कुमार और अजीत झा के साथ उन्होंने स्वराज अभियान बनाया (Recall विधेयक, भ्रष्टाचार-कानून सुधार और कृषि-संकट पर मुहिम चलाने वाला संगठन) जिससे जय किशन आंदोलन और 2016 में पंजीकृत राजनीतिक दल स्वराज इंडिया जन्मा, जिसके वे संस्थापक राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे। 2019 के लोकसभा चुनाव में दिल्ली के मतदाताओं को NOTA देने का उनका आह्वान प्रसिद्ध हुआ (NOTA को 'No Till an Alternative' पढ़ते हुए) उनका तर्क था कि किसी भी दल ने वादे पूरे नहीं किए। 2020–21 के किसान आंदोलन में वे संयुक्त किसान मोर्चा की समन्वय समिति में रहे और सिंघु बॉर्डर के सबसे परिचित नागरिक चेहरों में गिने गए। जब 2022 में राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा दक्षिण से उत्तर बढ़ी, तो वे उसमें शामिल हुए और उसे 'दक्षिणायन' आंदोलन बताया, दक्षिण की राजनीतिक संस्कारों को उत्तर ले जाने वाली धारा। उस यात्रा के उत्तरवर्ती भारत जोड़ो अभियान का उन्हें राष्ट्रीय संयोजक नियुक्त किया गया, और 2024 के चुनाव चक्र में वे फिर देश के सबसे उद्धृत स्वतंत्र चुनाव-पूर्वानुमाता रहे; उनके चरण-वार पूर्वानुमान की रातों-रात छानबीन The Week ने 5 जून 2024 को की। शिक्षा-भाषा पर उनकी स्थिति अद्वितीय है: वे उच्च शिक्षा में अंग्रेज़ी के दबदबे के विरोधी हैं और उतनी ही तीव्रता से इसे हिंदी से बदलने के विरोधी ("अंग्रेज़ी के स्थान पर हिंदी लाना मेरे लिए उतना ही बर्बरतापूर्ण है जितना आज अंग्रेज़ी का दबदबा") और मातृभाषाओं में उच्च शिक्षा के पक्षधर हैं।
यह अभिलेखागार के लिए क्यों महत्वपूर्ण है
यादव-केंद्रित अभिलेखागार में उनके महत्व के दो स्तर हैं। खोज-आँकड़ों में बिहार-यूपी खानदानों के बाहर उनके उपनाम वाले सबसे अधिक खोजे जाने वाले व्यक्तित्वों में वे निरंतर शामिल हैं ('Yogendra Yadav age', 'Yogendra Yadav AAP', 'Yogendra Yadav वर्तमान पार्टी') और यह प्रोफाइल उन प्रश्नों के उत्तर अफवाह नहीं, स्रोत-सहित तथ्य से देने के लिए मौजूद है। दूसरा स्तर शैक्षिक है: उनका जीवन-कार्य सीएसडीएस-लोकनीति के राज्य-चुनाव अध्ययनों ने ही वह डेटा दिया, जिससे यादव राजनीतिक उठाव को मापना संभव हुआ (OBC मतदान, सामाजिक न्याय की राजनीति, यूपी-बिहार के चुनावी चक्र) और उस साहित्य के निर्माता स्वयं वे ही हैं। बूथ पर यादव वोट गिनने वाला व्यक्ति, उतना ही खोजा जाने वाला जितने वे वोट देने वाले राजनेता। समुदाय-जीवन और राजनीति-विज्ञान का यह संगम इस अभिलेख में अद्वितीय है। राजनीति-संदर्भ हमारे राजनेता अभिलेख और यादव समुदाय की उत्पत्ति विशेषांक में दर्ज है।
यह प्रोफाइल कैसे सत्यापित हुई
तिथियाँ, पद, प्रकाशन और सम्मान Wikipedia के Yogendra Yadav लेख से लिए गए और Brown विश्वविद्यालय के Center for Contemporary South Asia पर उनका व्यावसायिक प्रोफाइल (watson.brown.edu) तथा The Week की 5 जून 2024 की रिपोर्ट से सुमेलित किए गए। 2015 के AAP निष्कासन में दोनों पक्षों की स्थितियाँ उनका दाताओं पर आरोपित करके दर्ज की गई हैं। जन्म-नाम एवं पारिवारिक विवरण उनके स्वयं के सार्वजनिक विवरणों से लिए गए हैं, जो उद्धृत जीवनी-साहित्य में सर्वव्यापी हैं। यह प्रोफाइल किसी विधायिका की वर्तमान सदस्यता नहीं दर्ज करती; सत्यापन तिथि तक कथित स्रोतों में उनका कोई निर्वाचित पद पाया नहीं जाता। किसी भी तथ्य में त्रुटि हेतु हमारी सुधार नीति 72 घंटे की प्रक्रिया निर्धारित करती है।